गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

अदिति शब्द का अर्थ

#अदिति_शब्द_का_प्रयोग_वेदों व पुराणों में बारम्बार हुआ है। पुराणों में अदिति को देवमाता कहा है। कहीं पृथ्वी को अदिति बतलाया जाता है, कहीं सम्पूर्ण त्रैलोक्य अदिति है, कही अन्य किसी स्थान पर संसार के पदार्थेां को , तत्व विशेष को अदिति कहा जाता है। कहीं गौ को अदिति कहा है। कहीं वाक् को अदिति कहा गया है। इस प्रकार अदिति कई स्थलों पर भिन्न-2 अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।
1.अदिति द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिताः स पुत्रः। विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्।
ऋक् संहिता।।
2. मा गामनागामदिति वधिष्ट । 3.वाखा अदिति। 4.इयं वै पृथिव्यादितिः । 5.सर्व का अदिति तददितेरदितित्वम्।
इस प्रकार यदि देखा जाय तो अदिति शब्द से कई अर्थ निकलने के कारण विरोधाभास प्रतीत होता है। दो धातु से दिति शब्द निष्पन्न होता है। जिसका तात्पर्य है कटा हुआ भाव विशेष ही दिति है। अतः जहाँ दिति का अभाव है किसी भाव की खण्डनावस्था नहीं हैं पूर्णता है, वहीं अदिति है। अविच्छिन्न तत्व ही अदिति है। सूर्य, पृथ्वी, नक्षत्र भेद से अदिति के तीन प्रकार की है। इन तीनों अदितियों में सभी अदितियों का अन्तर्भाव हो जाता है। सर्वप्रथम सूर्यमूला अदिति।
(1) सूर्यमूला अदितिः- पृथ्वी और सूर्य देा पिण्ड हैं, यहाँ सूर्यमूला अदिति को समझने के लिये हम मात्र इन दों पिण्डों पर ही ध्यान केन्द्रित करतें हैं कि एक ओर भूपिण्ड है, तथा दूसरी ओर सूर्यपिण्ड है। सूर्यपिण्ड का स्थान द्युलोक है एवं भूपिण्ड स्थान भूलोक कहा गया है। और दोनों में भेद है। भूपिण्ड अयं अर्थात् यह लोक कहा गया है तथा सूर्यपिण्ड असो अर्थात् वह लोक कहा गया है। इससें हम यह समझते हैं कि श्रुति (वेद) में जहाँ कहीं भी अयं लोकः का प्रयोग हुआ है। वहाँ भूलोक अर्थ करना चाहिये, और जहाँ कहीं भी असो लोकः का प्रयोग हुआ है वहाँ सूर्यलोक अर्थ होना है।
यह भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर एक निश्चित दीर्घमण्डलाकार पथ पर परिक्रमा करता है। इस दीर्घमण्डलाकार पथ को क्रान्तिवृत्त का नाम दिया गया है। इन दोनों पिण्डों यानि भूपिण्ड व सूर्यपिण्ड में भूत तथा प्राण दोनों की सत्ता है। भूपिण्ड पर प्राप्त भूत और प्राण में से जो भूत है वह पृथ्वी कहलाता है। यह भूत मर्त्यभाग है, तथा हम इसी मर्त्यभाग को देख रहें है। इसी प्रकार भूपिण्ड का जो प्राण है, वह अग्नि है, जिसे पार्थिव प्राण कहा गया है। तथा पूर्व में जो अग्नि के घन, तरल, विरल रूप से तीन प्रारूप कहे गये हैं, उनमें से यह घन रूप में पृथ्वी में प्रविष्ट है।
सूर्यपिण्ड का भूतभाग तेज है, जो कि दृश्य व स्पर्शेन्द्रियों द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है, एवं प्राण-भाग इन्द्र नाम से प्रसिद्ध है। तेजेामय सूर्यपिण्ड इन्द्रगर्भित है तात्पर्य है कि सूर्य के गर्भ में इन्द्र है। पंचावयव (जिसके पाँच अवयव हैं) ब्रह्माण्ड में भी इसको बताया है। यहाँ संक्षिप्त में पुनः कथन करना प्रासंगिक है। स्वयंभूमण्डल में ब्रह्म अक्षर है, तथा सृष्टि विकास क्रम में अक्षर विष्णु, क्षर रूप में आपोमय है, जोकि परमेष्ठी मण्डल में अक्षर स्वरूप धारण करता है। परमेष्ठी मण्डल मे विष्णु स्थिर है, प्राणमय है किन्तु सृष्टि विकास के क्रम में प्राणामय अप् का इन्द्र स्वरूप क्षर है, जिसका क्षरण सूर्यलोक में होता है वहाँ सूर्यलाक में इन्द्र अक्षर है, स्थिर है तथा प्राणमय है। सृष्टि विकास के क्रम में वाक् का क्षरण होता है, सोमात्मक अन्न रूप में वहाँ सोम स्थिर है, प्राणमय है एवं वहाँ से सोम का अन्न रूप में क्षरण होता है जहाँ सोमात्मक अन्न अक्षर होता है, तथा वहाँ से अन्न का क्षरण होता है जो पृथ्वी में अग्निरूप में अक्षर रहता है, तथा अन्नाद् रूप में क्षर। इस अन्न का ही अन्नाद रूप में उत्पत्ति ही जीव जगत् हैं जो नित्य परिवर्तनशील है और मरणधर्मा है।
इस प्रकार स्वयम्भू से क्रमश: क्षरण होते हुए इन्द्र, सूर्य के अक्षर स्वरूप का अधिष्ठाता होने से सूर्यलोक ही इन्द्रलोक है। इसी अभिप्राय से यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्यौरिन्द्रेण शतः कहा जाता है।
प्रधान देवताप्राणात्मक हैं, जिनका स्वयम्भू मण्डल से अप् रूप में प्रथम क्षरण प्रारम्भ होता है। अतः प्राण ही देवता है। भूत इस का आधार है भूत पर प्रतिष्ठित प्राणदेवता सर्वत्र रहते हैं अर्थात् चारो ओर व्याप्त रहते हैं।
अपितु समझा जाय तो अनतरिक्ष से प्रतिक्षण प्राणात्मक ऊर्जा का एक अजस्र प्रवाह भूपिण्ड की ओर हो रहा है, जो कि हमारे जीवन का आधार है। यही जीवनी शक्ति है, जिसे हम प्रत्यक्ष अथवा सामान्य रूप से न तो जान सकते हैं न ही देख सकते हैं, अपितु गहन चिन्तन व ध्यान की स्थिति में इसे अनुभव किया जा सकता हैं। पृथिवी का प्राणग्नि, पृथ्वी केन्द्र से निकल कर वर्तुलमण्डल (चक्राकार) बनाता हुआ पिण्ड से बड़ी दूरी पर्यन्त व्याप्त रहता है। ठीक उसी प्रकार सूर्यकेन्द्र में स्थिति प्राणात्मक इन्द्र सूर्यकेन्द्र से निकल कर उसी प्रकार बड़ी दूर पर्यन्त एक वर्तुलाकार (चक्राकार) मण्डल क्षेत्र में व्याप्त रहता है। इस वर्तुलमण्डल को आभामण्डल कहा जा सकता है। जिसे हम देवचित्रों में, देवविग्रहों में देवता मस्तक के पीछे प्रकाशित रूप में देखते हैं।
पृथ्वी में प्राणाग्नि गौण है, तथा भूतभाग प्रधान है, एवं सूर्य में भूत भाग गौण है व तेज भाग प्रधान है। अन्य प्रकार से कथन कहें कि पृथ्वी में प्राणग्नि यानि देवता अनुल्बण हैं, तथा सूर्य में भूतभाग गौण होने से भूत अनुल्बण है। अतः सिद्ध हुआ कि दोनों में दोनों हैं। साथ ही यह समझने योग्य तथ्य है कि पृथिवी में भी इन्द्र का अभाव नहीं, तथा सूर्य में अग्नि का अभाव नहीं है। परन्तु प्रधानता की स्थिति है, सूर्य में इन्द्रप्राण की तथा पृथिवी में अग्निप्राण की प्रधानता है। पार्थिव अग्निप्राण को गायत्र कहा गया है। यह गायत्राग्नि अष्टाक्षर बनता हुआ आठ वसु होकर एकरूप हो जाता है तथा वासव नाम से प्रतिष्ठित होता है। तथा बृहत् नाम से प्रसिद्ध महासाम से युक्त महःभावापन्न सौर इन्द्र मधवा कहलाता है। पार्थिव इन्द्राग्नी प्राण देवता पृथ्वी से निकलकर निरन्तर सूर्य में जाया करते है।
सौर इन्द्राग्नी सूर्य से निकल कर पृथिवी में आया करता है। इस आगति, गति से दोनों प्राणों का परस्पर यजन, यज्ञ या मेल होता है। यह नित्य यज्ञ ही विश्वस्वरूप का निर्माता तथा त्रैलोकी में प्रसिद्ध प्रकृति सिद्ध ऐन्द्राग्न यज्ञ है। इसमें दो तत्व हैं, इन्द्र तथा अग्नि। इन्द्र आत्माओं का कारक है तथा अग्नि भूतों का। सौर अग्नि ऐन्द्रप्राण प्रधान होने से इन्द्र है। अतएव उस में रहने वाली प्रजा दिव्यप्रजा अर्थात् देवता कहलाती है।
पार्थिव अग्निप्राण अग्निप्रधान है पृथ्वी पर जो अग्नि है वह सूर्य का अंश ही है किन्तु सूर्य से किंचित् भिन्नता के कारण इसे अग्नि नाम विशेष दिया गया है। इस अग्नि को ही मनु कहते है। मनु की प्रधानता होने से पार्थिवी प्रजा मानव नाम से प्रसिद्ध है। यद्यपि कई स्थलों पर सूर्य को भी मनु कहा है। इस प्रकार देव प्रजा तथा मानव प्रजा, ऐन्द्राग्न यज्ञ पर प्रतिष्ठित है। पृथिवी में रहने वाले आग्नेय प्राण की आभामण्डल सूर्यपिण्ड से ऊपर तक व्याप्त है। इनकी माप को अहर्गण में मापा जाता है। जैसे अन्तरिक्ष में गति को प्रकाश वर्ष से नापा जाता है उसी प्रकार किसी आभामण्डल के विस्तार के क्षेत्र को अहर्गण में नापा जाता है। अहर्गण से गिने तो 22वें अहर्गण तक है। पार्थिव प्राण का अवसान इस की बाह्य सीमा में होता है। अवसान ही साम है। किसी भी वस्तु के देखे जाने की अन्तिम सीमा ही उस वस्तु का साम है। अर्थात् यदि किसी वस्तु को हम जितनी दूरी से देख सकते हैं वह अन्तिम दूरी ही साम कहलाती है। कहीं कहीं पर इसे साममण्डल भी कहा है। इस साम मण्डल के कई विभाग हैं जो कि संख्या में एक हजार हैं। उनमें अन्तिम साम उदृचसाम कहलाता है। यही निधन साम नाम से भी प्रसिद्ध है।
सूर्य स्वयंप्रकाशमान् घन (उसमें जो पदार्थ है वो अत्यन्त घना है) पिण्ड है, अतः भूतप्रधानता पृथिवी के आग्नेयप्राण के आभामण्डल की तुलना में सूर्य के ऐन्द्रप्राण का आभामण्डल पृथ्वी से कहीं दूर पर्यन्त व्याप्त रहता है। सम्पूर्ण त्रैलोक्य इस सौरमण्डल में अन्तर्लीन हो रहा है। सूर्य का 21वाँ अहर्गण पृथिवी से अनन्त दूर स्थित है। उससे ऊपर सौर प्राण जाता है। क्योंकि सौरप्राण की सीमा के गर्भ में सब कुछ समाविष्ट है। सूर्य का ये आभामण्डल जहाँ तक जाता है उसे ही आधुनिक विज्ञान ने अपना सूर्य मण्डल कहा है। ऐसी सम्भावना की जा सकती है। इस सौर साम को बृहत्साम कहा जाता है। इसी कारण यह सूर्य स्वयम्भू, परमेष्ठी, चंद्र, पृथ्वी महाभुवनों के केन्द्र में बृहती छन्द पर प्रतिष्ठित होकर तप रहा है।
वेदि ही वेद की प्रतिष्ठा है। वेद ही यज्ञ की प्रतिष्ठा है। यज्ञ ही प्रजापति की प्रतिष्ठा है। प्रजापति ही प्रजा का प्रभव प्रतिष्ठा, परायण है। अतः सूर्यपिण्ड भूतवेदि है। सौरप्राणमण्डल प्राणवेदि है। यह प्राणवेदि भूतवेदि की अपेक्षा कहीं बड़ी है। अतएव इसे महावेदि कहा है। सूर्यपिण्ड स्वरूप वेदि से बाहर इस का स्वरूप प्रतिष्ठित है। अतएव इसे अन्तर्वेदि कहा जाता है। यही परिमिता वेदि है। वह अपरिमिता वेदि है। दोनों वेदियाँ एक सौर संस्था हैं। यही संस्था पृथिवी में है। भूपृष्ठ यदि पृथ्वी के धरातल से रथन्तरसाम यानि सूर्य से 22 अहर्गण पर्यन्त पृथिवी के आभामण्डल तक व्याप्त पार्थिव आग्नेय प्राणमण्डल महावेदि है।
भूपिण्ड अन्तर्वेदि है। दोनों का संयुक्त रूप यानि समष्टि पार्थिवमण्डल है। इसी वेदविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति का वाक्य है-
तस्याः (पृथिव्याः) एतत् परिमितां रूपं यदन्तर्वेदि।
अथैष भूमाऽपरिमितो यो बहिर्वेदि (ऐ.8/5)इति।
मध्यस्थ सूर्य का तेजोमय प्राण सर्वत्र प्रसरित होता हुआ हमारे भूपिण्ड पर भी आ रहा है। इसी प्राण की महिमा से अदिति, दिति का स्वरूप सम्पन्न होता है। सूर्यमण्डल से आता हुआ अविच्छिन प्राण भूमण्डल से स्पर्श करता हुआ किनारे स्पर्श करता हुआ निकल जाता है। तथा जो प्राण भूतल पर रहता है वह प्रतिफलित या परावर्तित होकर वापस सूर्य की ओर ही चला जाता है इस प्रकार पृथिवी पर आने वाले सौर प्राण का कुछ हिस्सा किनारों को स्पर्श करता हुआ सीधे आगे की ओर अन्तरिक्ष में चला जाता है एवं कुछ जो पृथ्वी से बाधित होता है, वह पृथ्वी से परावर्तित होकर पुनः सूर्य की ओर लोट जाता है। इसके परिणाम स्वरूप पृथ्वी का जो भाग सूर्य की ओर नहीं होता वह सूर्य प्राणों से वंचित रह जाता है।
इस सूर्यप्रकाश से प्रकाशित होेने वाले पृथ्वी तल से सूर्य पर्यन्त व्याप्त जो अविच्छिन्न अखण्डित प्राणमण्डल है, वही अदिति है। तथा सूर्य के प्रकाश से वंचित भाग तमोमय है जो कि दिति है। यहाँ सौर प्रकाश नहीं आता। इस तमोमय आसुर भाग को राहू कहा है। यह पार्थिव राहू का स्वरूप है जो कि सैंहिकेय नाम से प्रसिद्ध है। ये राहू दो प्रकार से प्रकट होते हैं जिस विधि से सूर्य के प्रकाश का प्रवाह भूमि की ओर हेाता है उसी प्रकार चन्द्रमा का प्रकाश भी पृथ्वी की ओर होता है एवं वह प्रकाश भी पृथ्वी के किनारों से टकराते हुये अन्तरिक्ष की ओर बढ़ जाता है एवं पृथ्वी का एक भाग प्रकाशित रहता है दूसरा भाग अप्रकाशित इस अप्रकाशित भाग को तमोमय असुर भाग कहा है जो कि राहू का दूसरा रूप है, इस प्रकार चन्द्रमा में उत्पन्न राहू को स्वर्भानु कहा है। सैंहिकेय राहु से चन्द्रग्रहण क्योंकि उस समय पृथ्वी पर आने वाले प्रकाश में बाधा सूर्य बनते हैं। उसी प्रकार स्वर्भानु से होता है क्योंकि उसे पृथ्वी पर आने वाले सूर्य के प्रकाश में चन्द्र बाधा बनता है।
अतः ऊपर से आकर पृथ्वी से टकराता हुआ, पृथ्वी के पदार्थों से युक्त होता हुआ सूर्य पर्यन्त रहने वाला जो पार्थिव प्राण संश्लिष्ट सौर प्राणमण्डल है, वही अविच्छिन्न धारा के कारण अदिति कहलाता है। सूर्यपिता तथा पृथ्वीमाता है। अदिति का स्वरूप माता पृथ्वी के सम्बन्ध से निष्पन्न होता है। अतएव पार्थिव भाग ही अदिति माना गया है।
यह भाग है पूर्व कथित महावेदि स्वरूपा बहिर्वेदि जो कि सूर्य से भी आगे 22 अहर्गण तक है पार्थिव आग्नेय प्राण जो कि सौर प्राण से मिलकर अदिति कहा गया है। 22 अहर्गण पर्यन्त विस्तृत यह पार्थिव अग्नि तीन भागों में विभक्त है त्रिवृत, पंचदश, एकविंश, स्तोम भेद से यानि त्रिवृतस्तेाम, पंचदशस्तोम, एकविंशस्तोम, इन तीनो एक ही पार्थिव अग्नि के भिन्न-भिन्न अवस्था विशेष विद्यमान हैं। त्रिवृत स्तोम में पार्थिव अग्नि ,अग्नि अवस्था है, पंचदशस्तोम में पार्थिव अग्नि, वायुरूप है। तथा एकविंश स्तोम में यह पार्थिव अग्नि आदित्याग्नि अवस्था में है। 8वसु, 11रूद्र व 12 आदित्य इन तीनों स्तोम के अधिदेवता हैं। ये सम्पूर्ण देवता ही विश्वेदेव कहलाते हैं। ये सब महापृथ्वी रूप अदिति में ही गर्भ धारण करते है, वहीं प्रतिष्ठित रहते हैं। इस अदिति से ही सब उत्पन्न हुए हैं इसीलिये श्रुति कहती हैः-
अदितिद्र्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिजर्नित्वम्।।
(2)पृथिवीमूला अदितिः– सूर्यमूला अदिति के उपरान्त अदिति का द्वितीय स्वरूप है, पृथिवीमूला अदिति। भूूमण्डल के दो विभाग है- दृष्यभाग और अदृष्य विभाग। जहाँ सूर्य की किरणें पड़ती हैं वह दृष्य भाग तथा जहाँ सूर्य की किरणें नहीं पड़ती व अदृष्य भाग। दृष्य भाग का नाम ही अदिति है, एवं अदृष्य भाग दिति है। इस प्रकार रात्रि में भी अदिति की सत्ता हो जाती है। यद्यपि सूर्यमूला अदिति का सम्बन्ध मात्र दिन से है। किन्तु पृथिवीमूला अदिति का रात्रि से भी सम्बन्ध है। क्यों कि रात्रि में दृष्य होता है। रात्रि में पृथ्वी के जिस भाग पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं वह अदिति है किन्तु इसके विपरीत रात्रि में सूर्य के न दिखाई देने से रात्रि में सूर्यमूला अदिति नहीं होती। सूर्यमूला अदिति 12 आदित्यों के साथ सूर्य से युक्त रहती है। इसके विपरीत पृथिवीमूला दृश्यकपाल रूप अदिति जो कि भूपिण्डात्मक है अपने आठपुलों के साथ ही सूर्य से युक्त होने का सामर्थ्य रखती है। पृथ्वी का पूलों के रूप में विभाजन करने पर इसके 16 पूल होते हैं। पृथ्वी एक बार में अपने 8 पूलों के साथ सूर्य से साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकती है। इसका कारण है कि पृथिवी अपने अक्ष पर घूमती हुई आगे बढ़ती है, तथा सूर्य द्वादश आदित्य प्राणों का धनात्मक स्वरूप है या द्वादश आदित्यप्राणों से घनीभूत हैं। ये 12 आदित्य अदिति पुत्र है। पूर्वक्षितिज पर सूर्योदय से पश्चिम क्षितिज पर्यन्त 7 आदित्य प्राण रहते है। पश्यन्ति सप्तमं सर्वे के अनुसार सामने का पश्चिम क्षितिजवाला आदित्य सातवाँ पड़ता है। आठवाँ स्वयं सूर्य है। सौरकाल इन आठ से ही युक्त है। अतः दिन में पृथिवी इन सातों से ही सूर्य के साथ युक्त होने में समर्थ होती है। इसी पृथिवीमूला अदिति के स्वरूप को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है।
वीवीवीअष्टौ पुत्रसो अदितिर्ये जातास्तन्वरि।
देवा उपप्प्रैत् सप्तभिः परा मार्तण्डमास्यत्।।
ऋक् 10/72/8/
पृथिवी का सम्पूर्ण वृत्त अदिति है। दिन भी अदिति है। रात्रि भी अदिति है। साथ ही सम्पूर्ण भूपिण्ड दिति भी है। दिन में आधा दृष्यभाग अदिति है। अदृष्य भाग दिति है। रात्रि में दिन का दृष्य भाग दिति है। अदृष्य भाग अदिति है। एक उदाहरण से इस पूरे प्रक्रम को समझा जा सकता है माना हम जिस भाग में रहते हैं उस भाग में दिन है अतः वह भाग अदिति है, तथा इसके विपरीत वाला भाग जहाँ सूर्य की किरणें नहीं पहुँचती वहाँ रात्रि होने के कारण दिति है। अब पृथ्वी के उसी दिन वाले भू-भाग पर जब रात्रि होती है तो उस रात्रि में हमारे दिन वाले दृष्यभाग के अदृष्य हो जाने के कारण हमारा वाला पृथ्वी का भू-भाग अब दिति है। इसी प्रकार पृथ्वी के जिस भाग में पूर्व में रात्रि होने कारण अदृश्यता व दिति स्वरूप विद्यमान था वह अदृश्य भाग हमारे यहाँ रात्रि होते हुये भी वहाँ सूर्य की किरणों की उपस्थिति के कारण दृश्य बनता हुआ अदिति कहलाता है। अतः कहा है-
इयं वै पृथिवी अदितिः- इयं ह्येव दितिः।
(3) नक्षत्रमूला अदितिः- तीसरी है नक्षत्रमूला अदिति, यही तीसरी अदिति कही गयी है। इसे समझने से पूर्व यहाँ यह समझना आवश्यक है कि क्रान्ति वृत्त किसे कहते है?
समाधान है कि पृथ्वी एक निष्चित मार्ग पर चलती हुई सूर्य के चारों ओर नित्य परिक्रमा करती है। इसी परिक्रमा मार्ग को क्रान्ति वृत्त कहा जाता है तथा यह वृत्त दीर्घवृत्ताकार का है।
जिस प्रकार पृथ्वी का सूर्य के चतुर्दिक् दीर्घवृत्ताकार परिभ्रमण मार्ग है, ठीक उसी प्रकार चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों ओर एक परिभ्रमण मार्ग है। इस चन्द्र परिभ्रमणवृत्त को दक्षवृत्त कहा गया है। दक्षवृत्त चन्द्रमा के सम्बन्ध से सोममय है। सौम्यप्राण स्त्री (योषा) कहे गए हैं। इस सेाम्य प्राण की स्थिति दक्ष मार्ग पर है। अतः इसीलिये पुराणों में वेद के विज्ञान को समझाते हुये इसे दक्ष की कन्या बताया गया है। इसके विपरीत वृषा प्राण यानि पुरूष प्राण हैं। जैसे सूर्य, चंद्र अरिष्टनेमि, धर्म, अंगिरा, कृशाश्वा, भार्गव आदि ये देवताप्राण हैं, ऋषिप्राण हैं, इस दक्षवृत्त के जिस पर योषा प्राण स्थित है उसके 60 स्वरूप प्रकट होते हैं। 60 रूप में प्रकट होने वाले योषा स्त्री प्राणों के साथ सम्बन्ध होता है। पुराणों की भाषा में इस दिव्य ज्ञान को सहज ही समझाया गया है कि दक्ष की 60 कन्याएँ थीं जिनका विभिन्न देवताओं व ऋषियों से विवाह हुआ। वस्तुतः पुराणों में वर्णित वह चर्चा स्पष्ट रूप से भूलोक व अन्तरिक्षलोक का इतिवृत्त है। जो घटना अन्तरिक्ष में अदृश्य प्राणात्मक शक्तियों द्वारा हुई उसी का निदर्शन आदर्श रूप में प्रस्तुत करने हेतु उन प्राणशक्तियों द्वारा ही दिव्य देह धारण की गई तथा उस अन्तरिक्ष्य शक्ति प्रक्रिया की भौतिक रूप में प्रतिकृति हुई, इसका ही उल्लेख हमें पुराणों में मिलता है। चन्द्रमा का परिभ्रमण वृत्त दक्षवृत्त जिस पर सौम्य योषा प्राण अवस्थित है उसके 60 भाग एक ही प्रकार से नहीं हुए अपितु भिन्न2 प्रकारसे हुए। दक्षवृत्त पर स्थित प्राण के 27 भाग हुए तथा 27 भागों का समुच्चय चन्द्र पत्नि बना पुनः उस प्राणात्मक शक्ति ने स्वयं चार भागों में बाँटा तब उसके साथ अरिष्टनेमि का विवाह हुआ। दक्षवृत्त द्विधा विभक्त होकर नये योषा प्राणात्मक स्वरूप में प्रकट हुआ, तब उन देानों का सम्बन्ध अंगिरा से हुआ। धर्म के सम्बन्ध में 10 विभाग हुए। भार्गव के सम्बन्ध में 2 विभाग हुए। मलिम्लुच(अधिकमास) के सम्बन्ध से सौर सम्वत्सर के 13 विभाग हो जाते अतः सूर्य का सम्बन्ध 16 से है।
सूर्य कश्यपरूप में परिणीत होकर ही प्रजा का निर्माण करता है। सूर्य से निकलकर त्रैलोक्य में फैलने वाला सौरप्राण जो जीव की उत्पत्ति में सर्वथा प्रमुख है वह ही कश्यप कहलाता है। तथा सूर्यरश्मियाँ मरीचि नाम से प्रसिद्ध है। इन मरीचियों में परस्पर घर्षण होता है। ये मरीचियाँ अग्निमयीं हैं। अग्नेरापः अग्नि ही जल है, इस सिद्धान्त से इस आग्नेय घर्षण यानि मरीचियों के घर्षण से पानी उत्पन्न हो जाता है। यह पानी रूद्रवायु के सम्पर्क से घनभाव अर्थात् ठोस में बदलता है। जैसे दूध अत्यधिक ताप से तथा ऊपर हवा लगने के कारण ऊपरी भाग में जमकर मलाई बनता है। इसे वेद विज्ञान की तकनीकी भाषा में कहा जायेगा कि दूध का द्रवभाग और बाहर की वायु दोनों प्रतिमूर्छित होकर अर्थात् आपस में एक दूसरे से मिलकर अलग नहीं होकर एक ही साथ स्थित रही ऐसी स्थिति होकर वे घन बन जाते है। इसी प्रकार सूर्य से उत्पन्न मरीचियों के घर्षण से उत्पन्न पानी और आन्तरिक्ष्य वायु दोनों प्रतिमूर्छित होकर घन बन जाते है। इसे अपांशर कहा जाता है।
पुनः यदि दूध को और अधिक अग्नि दी जाय तो वह मावा बन जाता है। तथा पिण्डरूप धारण करता है। यही अवस्था यहाँ भी होती है। यही प्रक्रिया पृथ्वी निर्माण के सन्दर्भ में होती है कि आन्तरिक्ष्य एमूष वराह नामक वायु व सौर रश्मियों द्वारा इसका सम्पादन होता है। इसकी प्रक्रिया वेदविज्ञान की भाषा में इस प्रकार है की एमूषवराह की कृपा से आपोमय महासमुद्र में परमाणुरूप से यहाँ वहाँ बिखरे हुए पार्थिव परमाणुओं का संहनन होता है। यानि परस्पर टक्कर होती है, अतएव वे परमाणु आगे जाकर भूपिण्ड रूप में परिणत हो जाते हैं।
पृथ्वीपिण्ड यद्यपि मरीचि यानी पानी से बना है, परन्तु ठोस भाव अग्नि के कारण आया है। अग्नि की रूक्षता ने ही पानी को पिण्डरूप में परिवर्तीत किया है। जिससे पृथ्वी का निर्माण हुआ।
पूर्ववर्णित दक्षवृत्त पर स्थित सौम्यप्राण रूप दक्ष की 60 कन्याओं के कश्यप के साथ सम्बन्ध रखने वाली 13 दाक्षायणियों (दक्ष की पुत्रियाँ) में से अदिति नाम की स्थिर दाक्षायणि है। सम्पूर्ण प्रजा का प्रभव-प्रतिष्ठा-परायण-भूत कूर्मप्रजापति को सम्वत्सर प्रजापति कहते है। इस आदित्यात्मक सम्वत्सररूप कूर्मप्रजापति के 13 अवयव है। इसके सम्बन्ध में उस दक्षवृत्त के 13 विभाग हो जाते है। वे तेरहों ही देव, दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, मनुश्य, कीट, पशु, पक्षी, औषधि, वनस्पति, धातु, दिव, रस आदि आदि यच्चायावत् स्थावर जङ्गम् प्रजाओं की जननियाँ हैं। पिता सूर्य रूप कूर्म है। इसी आधार पर कहा हैः-
नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः
निश्चय ही सारी प्रजा सूर्य के द्वारा उत्पन्न है। यदि पूर्वोक्त सभी दाक्षायणियों का संकलन किया जाय तो इनके 60 विभाग हो जाते है। ये ही दक्षप्रजापति की 60 कन्याएँ हैं,जो कि तत्तत देवताओं, ऋषिप्राणों से संयुक्त होकर तत्तत प्रजा का निमार्ण करती हैं, यह है अधिदैविक चरित्र। इसी से अध्यात्मसृष्टि होती है। एवं इसी से अधिभूत सृष्टि होती है। अतएव यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार जो व्यवस्था अधिदैवत में है, वही अध्यात्म एवं वह ही अधिभूत में भी। इसी भूमण्डल पर आदित्यादि मनुष्य देवता थे। दक्ष प्रजापति थे उनकी 60 कन्याएँ थीं तथा उनको भूलोकस्थ देव ऋषियों से विवाह हुआ। पुराण का श्लोक है।
दक्षस्तु षष्टि कन्यास्तु सप्तविंशतिमिन्दवे।
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।।1।।
द्वे चैवाङ्गिरसे प्रदाद् द्वे कशाष्याय धीमते।
द्वे चैव भृगुपुत्राय चतस्रोऽरिष्टनेमिने इति।।2।।
इस प्रकार सम्वत्सर के 13 विभाग सर्वथा नियत हैं। इनमें एक विभाग दिति है। एवं एक अदिति है। सम्वत्सर प्रजापति का दिति के साथ संयोग होने से यज्ञ विरोधी दैत्य उत्पन्न होते है, तथा अदिति के साथ संयोग से यज्ञमूलक आदित्य उत्पन्न होते हैं, जो कि बुद्धिमान् हैं, ज्योतिर्धन है, सत्यानुयायी है, आधे खगोल में देवताओं का राज्य हैं, इस खगोल मण्डल को यज्ञीय मण्डल कहा गया है। एक ओर स्वाती नक्षत्र है दूसरी ओर अश्विनी नक्षत्र है। और रेवती नक्षत्र दोनों के मध्य की बिन्दू है। आकाश का यह प्रदेश ही अदिति है। इस स्थान पर पुनर्वसु नक्षत्र है। पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण पर ही अदिति बिन्दू है। पूर्व में स्वाती नक्षत्र पर्यन्त इसकी व्याप्ति है। पश्चिम में अश्विनी, रेवती नक्षत्र की मध्य बिन्दू पर्यन्त इसकी स्थिति है।

इस देवमण्डल में स्वाती से रेवती पर्यन्त 13 नक्षत्रों का भोग है। जिसे नक्षत्र अदिति कहा ।