शनिवार, 24 जनवरी 2026

पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका

 🌹पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका🌹—–


* दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।


* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।


* प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।


* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।


* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।


* कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए।


* जापान के सुविख्यात चिकित्सक डॉ. कताज का विश्वास है कि जो औरत गर्भ ठहरने के पहले तथा बाद कैल्शियमयुक्त भोज्य पदार्थ तथा औषधि का इस्तेमाल करती है, उसे अक्सर लड़का तथा जो मेग्निशियमयुक्त भोज्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, अंडा आदि का इस्तेमाल करती है, उसे लड़की पैदा होती है।


विश्वविख्यात वैज्ञानिक प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लेण्डरम बी. शैटल्स ने हजारों अमेरिकन दंपतियों पर प्रयोग कर प्रमाणित कर दिया है कि स्त्री में अंडा निकलने के समय से जितना करीब स्त्री को गर्भधारण कराया जाए, उतनी अधिक पुत्र होने की संभावना बनती है। उनका कहना है कि गर्भधारण के समय यदि स्त्री का योनि मार्ग क्षारीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्र तथा अम्लीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्री होने की संभावना बनती है।


यदि आप पुत्र चाहते है !

दंपति की इच्छा होती है कि उनके घर में आने वाला नया सदस्य पुत्र ही हो। कुछ लोग पुत्र-पुत्री में भेद नहीं करते, ऐसे लोगों का प्रतिशत बहुत कम है। यदि आप पुत्र चाहते हैं या पुत्री चाहते हैं तो कुछ तरीके यहां दिए जा रहे हैं, जिन पर अमल कर उसी तरीके से सम्भोग करें तो आप कुछ हद तक अपनी मनचाही संतान प्राप्त कर सकते हैं-

* पुत्र प्राप्ति हेतु मासिक धर्म के चौथे दिन सहवास की रात्रि आने पर एक प्याला भरकर चावल का धोवन यानी मांड में एक नीबू का रस निचोड़कर पी जावें। अगर इच्छुक महिला रजोधर्म से मुक्ति पाकर लगातार तीन दिन चावल का धोवन यानी मांड में एक नीबू निचोड़कर पीने के बाद उत्साह से पति के साथ सहवास करे तो उसकी पुत्र की कामना के लिए भगवान को भी वरदान देना पड़ेगा। गर्भ न ठहरने तक प्रतिमाह यह प्रयोग तीन दिन तक करें, गर्भ ठहरने के बाद नहीं करें।

* गर्भाधान के संबंध में आयुर्वेद में लिखा है कि गर्भाधान ऋतुकाल (मासिक धर्म) की आठवीं, दसवीं और बारहवीं रात्रि को ही किया जाना चाहिए। जिस दिन मासिक ऋतु स्राव शुरू हो, उस दिन तथा रात को प्रथम दिन या रात मानकर गिनती करना चाहिए। छठी, आठवीं आदि सम रात्रियां पुत्र उत्पत्ति के लिए और सातवीं, नौवीं आदि विषम रात्रियां पुत्री की उत्पत्ति के लिए होती हैं अतः जैसी संतान की इच्छा हो, उसी रात्रि को गर्भाधान करना चाहिए।

* इस संबंध में एक और बात का ध्यान रखें कि इन रात्रियों के समय शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रात (पूर्णिमा) वाला पखवाड़ा भी हो, यह अनिवार्य है, यानी कृष्ण पक्ष की रातें हों तो गर्भाधान की इच्छा से सहवास न कर परिवार नियोजन के साधन अपनाना चाहिए।

* शुक्ल पक्ष में जैसे-जैसे तिथियां बढ़ती हैं, वैसे-वैसे चन्द्रमा की कलाएं बढ़ती हैं। इसी प्रकार ऋतुकाल की रात्रियों का क्रम जैसे-जैसे बढ़ता है, वैसे-वैसे पुत्र उत्पन्न होने की संभावना बढ़ती है, यानी छठवीं रात की अपेक्षा आठवीं, आठवीं की अपेक्षा दसवीं, दसवीं की अपेक्षा बारहवीं रात अधिक उपयुक्त होती है।

* पूरे मास में इस विधि से किए गए सहवास के अलावा पुनः सहवास नहीं करना चाहिए, वरना घपला भी हो सकता है। ऋतु दर्शन के दिन से 16 रात्रियों में शुरू की चार रात्रियां, ग्यारहवीं व तेरहवीं और अमावस्या की रात्रि गर्भाधान के लिए वर्जित कही गई है। सिर्फ सम संख्या यानी छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं और चौदहवीं रात्रि को ही गर्भाधान संस्कार करना चाहिए।

* गर्भाधान वाले दिन व रात्रि में आहार-विहार एवं आचार-विचार शुभ पवित्र रखते हुए मन में हर्ष व उत्साह रखना चाहिए। गर्भाधान के दिन से ही चावल की खीर, दूध, भात, शतावरी का चूर्ण दूध के साथ रात को सोते समय, प्रातः मक्खन-मिश्री, जरा सी पिसी काली मिर्च मिलाकर ऊपर से कच्चा नारियल व सौंफ खाते रहना चाहिए, यह पूरे नौ माह तक करना चाहिए, इससे होने वाली संतान गौरवर्ण, स्वस्थ, सुडौल होती है।

* गोराचन 30 ग्राम, गंजपीपल 10 ग्राम, असगंध 10 ग्राम, तीनों को बारीक पीसें, चौथे दिन स्नान के बाद पांच दिनों तक प्रयोग में लाएं, गर्भधारण के साथ ही पुत्र अवश्य पैदा होगा।


।। जय श्री राम ।।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

अदिति शब्द का अर्थ

#अदिति_शब्द_का_प्रयोग_वेदों व पुराणों में बारम्बार हुआ है। पुराणों में अदिति को देवमाता कहा है। कहीं पृथ्वी को अदिति बतलाया जाता है, कहीं सम्पूर्ण त्रैलोक्य अदिति है, कही अन्य किसी स्थान पर संसार के पदार्थेां को , तत्व विशेष को अदिति कहा जाता है। कहीं गौ को अदिति कहा है। कहीं वाक् को अदिति कहा गया है। इस प्रकार अदिति कई स्थलों पर भिन्न-2 अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।
1.अदिति द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिताः स पुत्रः। विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्।
ऋक् संहिता।।
2. मा गामनागामदिति वधिष्ट । 3.वाखा अदिति। 4.इयं वै पृथिव्यादितिः । 5.सर्व का अदिति तददितेरदितित्वम्।
इस प्रकार यदि देखा जाय तो अदिति शब्द से कई अर्थ निकलने के कारण विरोधाभास प्रतीत होता है। दो धातु से दिति शब्द निष्पन्न होता है। जिसका तात्पर्य है कटा हुआ भाव विशेष ही दिति है। अतः जहाँ दिति का अभाव है किसी भाव की खण्डनावस्था नहीं हैं पूर्णता है, वहीं अदिति है। अविच्छिन्न तत्व ही अदिति है। सूर्य, पृथ्वी, नक्षत्र भेद से अदिति के तीन प्रकार की है। इन तीनों अदितियों में सभी अदितियों का अन्तर्भाव हो जाता है। सर्वप्रथम सूर्यमूला अदिति।
(1) सूर्यमूला अदितिः- पृथ्वी और सूर्य देा पिण्ड हैं, यहाँ सूर्यमूला अदिति को समझने के लिये हम मात्र इन दों पिण्डों पर ही ध्यान केन्द्रित करतें हैं कि एक ओर भूपिण्ड है, तथा दूसरी ओर सूर्यपिण्ड है। सूर्यपिण्ड का स्थान द्युलोक है एवं भूपिण्ड स्थान भूलोक कहा गया है। और दोनों में भेद है। भूपिण्ड अयं अर्थात् यह लोक कहा गया है तथा सूर्यपिण्ड असो अर्थात् वह लोक कहा गया है। इससें हम यह समझते हैं कि श्रुति (वेद) में जहाँ कहीं भी अयं लोकः का प्रयोग हुआ है। वहाँ भूलोक अर्थ करना चाहिये, और जहाँ कहीं भी असो लोकः का प्रयोग हुआ है वहाँ सूर्यलोक अर्थ होना है।
यह भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर एक निश्चित दीर्घमण्डलाकार पथ पर परिक्रमा करता है। इस दीर्घमण्डलाकार पथ को क्रान्तिवृत्त का नाम दिया गया है। इन दोनों पिण्डों यानि भूपिण्ड व सूर्यपिण्ड में भूत तथा प्राण दोनों की सत्ता है। भूपिण्ड पर प्राप्त भूत और प्राण में से जो भूत है वह पृथ्वी कहलाता है। यह भूत मर्त्यभाग है, तथा हम इसी मर्त्यभाग को देख रहें है। इसी प्रकार भूपिण्ड का जो प्राण है, वह अग्नि है, जिसे पार्थिव प्राण कहा गया है। तथा पूर्व में जो अग्नि के घन, तरल, विरल रूप से तीन प्रारूप कहे गये हैं, उनमें से यह घन रूप में पृथ्वी में प्रविष्ट है।
सूर्यपिण्ड का भूतभाग तेज है, जो कि दृश्य व स्पर्शेन्द्रियों द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है, एवं प्राण-भाग इन्द्र नाम से प्रसिद्ध है। तेजेामय सूर्यपिण्ड इन्द्रगर्भित है तात्पर्य है कि सूर्य के गर्भ में इन्द्र है। पंचावयव (जिसके पाँच अवयव हैं) ब्रह्माण्ड में भी इसको बताया है। यहाँ संक्षिप्त में पुनः कथन करना प्रासंगिक है। स्वयंभूमण्डल में ब्रह्म अक्षर है, तथा सृष्टि विकास क्रम में अक्षर विष्णु, क्षर रूप में आपोमय है, जोकि परमेष्ठी मण्डल में अक्षर स्वरूप धारण करता है। परमेष्ठी मण्डल मे विष्णु स्थिर है, प्राणमय है किन्तु सृष्टि विकास के क्रम में प्राणामय अप् का इन्द्र स्वरूप क्षर है, जिसका क्षरण सूर्यलोक में होता है वहाँ सूर्यलाक में इन्द्र अक्षर है, स्थिर है तथा प्राणमय है। सृष्टि विकास के क्रम में वाक् का क्षरण होता है, सोमात्मक अन्न रूप में वहाँ सोम स्थिर है, प्राणमय है एवं वहाँ से सोम का अन्न रूप में क्षरण होता है जहाँ सोमात्मक अन्न अक्षर होता है, तथा वहाँ से अन्न का क्षरण होता है जो पृथ्वी में अग्निरूप में अक्षर रहता है, तथा अन्नाद् रूप में क्षर। इस अन्न का ही अन्नाद रूप में उत्पत्ति ही जीव जगत् हैं जो नित्य परिवर्तनशील है और मरणधर्मा है।
इस प्रकार स्वयम्भू से क्रमश: क्षरण होते हुए इन्द्र, सूर्य के अक्षर स्वरूप का अधिष्ठाता होने से सूर्यलोक ही इन्द्रलोक है। इसी अभिप्राय से यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्यौरिन्द्रेण शतः कहा जाता है।
प्रधान देवताप्राणात्मक हैं, जिनका स्वयम्भू मण्डल से अप् रूप में प्रथम क्षरण प्रारम्भ होता है। अतः प्राण ही देवता है। भूत इस का आधार है भूत पर प्रतिष्ठित प्राणदेवता सर्वत्र रहते हैं अर्थात् चारो ओर व्याप्त रहते हैं।
अपितु समझा जाय तो अनतरिक्ष से प्रतिक्षण प्राणात्मक ऊर्जा का एक अजस्र प्रवाह भूपिण्ड की ओर हो रहा है, जो कि हमारे जीवन का आधार है। यही जीवनी शक्ति है, जिसे हम प्रत्यक्ष अथवा सामान्य रूप से न तो जान सकते हैं न ही देख सकते हैं, अपितु गहन चिन्तन व ध्यान की स्थिति में इसे अनुभव किया जा सकता हैं। पृथिवी का प्राणग्नि, पृथ्वी केन्द्र से निकल कर वर्तुलमण्डल (चक्राकार) बनाता हुआ पिण्ड से बड़ी दूरी पर्यन्त व्याप्त रहता है। ठीक उसी प्रकार सूर्यकेन्द्र में स्थिति प्राणात्मक इन्द्र सूर्यकेन्द्र से निकल कर उसी प्रकार बड़ी दूर पर्यन्त एक वर्तुलाकार (चक्राकार) मण्डल क्षेत्र में व्याप्त रहता है। इस वर्तुलमण्डल को आभामण्डल कहा जा सकता है। जिसे हम देवचित्रों में, देवविग्रहों में देवता मस्तक के पीछे प्रकाशित रूप में देखते हैं।
पृथ्वी में प्राणाग्नि गौण है, तथा भूतभाग प्रधान है, एवं सूर्य में भूत भाग गौण है व तेज भाग प्रधान है। अन्य प्रकार से कथन कहें कि पृथ्वी में प्राणग्नि यानि देवता अनुल्बण हैं, तथा सूर्य में भूतभाग गौण होने से भूत अनुल्बण है। अतः सिद्ध हुआ कि दोनों में दोनों हैं। साथ ही यह समझने योग्य तथ्य है कि पृथिवी में भी इन्द्र का अभाव नहीं, तथा सूर्य में अग्नि का अभाव नहीं है। परन्तु प्रधानता की स्थिति है, सूर्य में इन्द्रप्राण की तथा पृथिवी में अग्निप्राण की प्रधानता है। पार्थिव अग्निप्राण को गायत्र कहा गया है। यह गायत्राग्नि अष्टाक्षर बनता हुआ आठ वसु होकर एकरूप हो जाता है तथा वासव नाम से प्रतिष्ठित होता है। तथा बृहत् नाम से प्रसिद्ध महासाम से युक्त महःभावापन्न सौर इन्द्र मधवा कहलाता है। पार्थिव इन्द्राग्नी प्राण देवता पृथ्वी से निकलकर निरन्तर सूर्य में जाया करते है।
सौर इन्द्राग्नी सूर्य से निकल कर पृथिवी में आया करता है। इस आगति, गति से दोनों प्राणों का परस्पर यजन, यज्ञ या मेल होता है। यह नित्य यज्ञ ही विश्वस्वरूप का निर्माता तथा त्रैलोकी में प्रसिद्ध प्रकृति सिद्ध ऐन्द्राग्न यज्ञ है। इसमें दो तत्व हैं, इन्द्र तथा अग्नि। इन्द्र आत्माओं का कारक है तथा अग्नि भूतों का। सौर अग्नि ऐन्द्रप्राण प्रधान होने से इन्द्र है। अतएव उस में रहने वाली प्रजा दिव्यप्रजा अर्थात् देवता कहलाती है।
पार्थिव अग्निप्राण अग्निप्रधान है पृथ्वी पर जो अग्नि है वह सूर्य का अंश ही है किन्तु सूर्य से किंचित् भिन्नता के कारण इसे अग्नि नाम विशेष दिया गया है। इस अग्नि को ही मनु कहते है। मनु की प्रधानता होने से पार्थिवी प्रजा मानव नाम से प्रसिद्ध है। यद्यपि कई स्थलों पर सूर्य को भी मनु कहा है। इस प्रकार देव प्रजा तथा मानव प्रजा, ऐन्द्राग्न यज्ञ पर प्रतिष्ठित है। पृथिवी में रहने वाले आग्नेय प्राण की आभामण्डल सूर्यपिण्ड से ऊपर तक व्याप्त है। इनकी माप को अहर्गण में मापा जाता है। जैसे अन्तरिक्ष में गति को प्रकाश वर्ष से नापा जाता है उसी प्रकार किसी आभामण्डल के विस्तार के क्षेत्र को अहर्गण में नापा जाता है। अहर्गण से गिने तो 22वें अहर्गण तक है। पार्थिव प्राण का अवसान इस की बाह्य सीमा में होता है। अवसान ही साम है। किसी भी वस्तु के देखे जाने की अन्तिम सीमा ही उस वस्तु का साम है। अर्थात् यदि किसी वस्तु को हम जितनी दूरी से देख सकते हैं वह अन्तिम दूरी ही साम कहलाती है। कहीं कहीं पर इसे साममण्डल भी कहा है। इस साम मण्डल के कई विभाग हैं जो कि संख्या में एक हजार हैं। उनमें अन्तिम साम उदृचसाम कहलाता है। यही निधन साम नाम से भी प्रसिद्ध है।
सूर्य स्वयंप्रकाशमान् घन (उसमें जो पदार्थ है वो अत्यन्त घना है) पिण्ड है, अतः भूतप्रधानता पृथिवी के आग्नेयप्राण के आभामण्डल की तुलना में सूर्य के ऐन्द्रप्राण का आभामण्डल पृथ्वी से कहीं दूर पर्यन्त व्याप्त रहता है। सम्पूर्ण त्रैलोक्य इस सौरमण्डल में अन्तर्लीन हो रहा है। सूर्य का 21वाँ अहर्गण पृथिवी से अनन्त दूर स्थित है। उससे ऊपर सौर प्राण जाता है। क्योंकि सौरप्राण की सीमा के गर्भ में सब कुछ समाविष्ट है। सूर्य का ये आभामण्डल जहाँ तक जाता है उसे ही आधुनिक विज्ञान ने अपना सूर्य मण्डल कहा है। ऐसी सम्भावना की जा सकती है। इस सौर साम को बृहत्साम कहा जाता है। इसी कारण यह सूर्य स्वयम्भू, परमेष्ठी, चंद्र, पृथ्वी महाभुवनों के केन्द्र में बृहती छन्द पर प्रतिष्ठित होकर तप रहा है।
वेदि ही वेद की प्रतिष्ठा है। वेद ही यज्ञ की प्रतिष्ठा है। यज्ञ ही प्रजापति की प्रतिष्ठा है। प्रजापति ही प्रजा का प्रभव प्रतिष्ठा, परायण है। अतः सूर्यपिण्ड भूतवेदि है। सौरप्राणमण्डल प्राणवेदि है। यह प्राणवेदि भूतवेदि की अपेक्षा कहीं बड़ी है। अतएव इसे महावेदि कहा है। सूर्यपिण्ड स्वरूप वेदि से बाहर इस का स्वरूप प्रतिष्ठित है। अतएव इसे अन्तर्वेदि कहा जाता है। यही परिमिता वेदि है। वह अपरिमिता वेदि है। दोनों वेदियाँ एक सौर संस्था हैं। यही संस्था पृथिवी में है। भूपृष्ठ यदि पृथ्वी के धरातल से रथन्तरसाम यानि सूर्य से 22 अहर्गण पर्यन्त पृथिवी के आभामण्डल तक व्याप्त पार्थिव आग्नेय प्राणमण्डल महावेदि है।
भूपिण्ड अन्तर्वेदि है। दोनों का संयुक्त रूप यानि समष्टि पार्थिवमण्डल है। इसी वेदविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति का वाक्य है-
तस्याः (पृथिव्याः) एतत् परिमितां रूपं यदन्तर्वेदि।
अथैष भूमाऽपरिमितो यो बहिर्वेदि (ऐ.8/5)इति।
मध्यस्थ सूर्य का तेजोमय प्राण सर्वत्र प्रसरित होता हुआ हमारे भूपिण्ड पर भी आ रहा है। इसी प्राण की महिमा से अदिति, दिति का स्वरूप सम्पन्न होता है। सूर्यमण्डल से आता हुआ अविच्छिन प्राण भूमण्डल से स्पर्श करता हुआ किनारे स्पर्श करता हुआ निकल जाता है। तथा जो प्राण भूतल पर रहता है वह प्रतिफलित या परावर्तित होकर वापस सूर्य की ओर ही चला जाता है इस प्रकार पृथिवी पर आने वाले सौर प्राण का कुछ हिस्सा किनारों को स्पर्श करता हुआ सीधे आगे की ओर अन्तरिक्ष में चला जाता है एवं कुछ जो पृथ्वी से बाधित होता है, वह पृथ्वी से परावर्तित होकर पुनः सूर्य की ओर लोट जाता है। इसके परिणाम स्वरूप पृथ्वी का जो भाग सूर्य की ओर नहीं होता वह सूर्य प्राणों से वंचित रह जाता है।
इस सूर्यप्रकाश से प्रकाशित होेने वाले पृथ्वी तल से सूर्य पर्यन्त व्याप्त जो अविच्छिन्न अखण्डित प्राणमण्डल है, वही अदिति है। तथा सूर्य के प्रकाश से वंचित भाग तमोमय है जो कि दिति है। यहाँ सौर प्रकाश नहीं आता। इस तमोमय आसुर भाग को राहू कहा है। यह पार्थिव राहू का स्वरूप है जो कि सैंहिकेय नाम से प्रसिद्ध है। ये राहू दो प्रकार से प्रकट होते हैं जिस विधि से सूर्य के प्रकाश का प्रवाह भूमि की ओर हेाता है उसी प्रकार चन्द्रमा का प्रकाश भी पृथ्वी की ओर होता है एवं वह प्रकाश भी पृथ्वी के किनारों से टकराते हुये अन्तरिक्ष की ओर बढ़ जाता है एवं पृथ्वी का एक भाग प्रकाशित रहता है दूसरा भाग अप्रकाशित इस अप्रकाशित भाग को तमोमय असुर भाग कहा है जो कि राहू का दूसरा रूप है, इस प्रकार चन्द्रमा में उत्पन्न राहू को स्वर्भानु कहा है। सैंहिकेय राहु से चन्द्रग्रहण क्योंकि उस समय पृथ्वी पर आने वाले प्रकाश में बाधा सूर्य बनते हैं। उसी प्रकार स्वर्भानु से होता है क्योंकि उसे पृथ्वी पर आने वाले सूर्य के प्रकाश में चन्द्र बाधा बनता है।
अतः ऊपर से आकर पृथ्वी से टकराता हुआ, पृथ्वी के पदार्थों से युक्त होता हुआ सूर्य पर्यन्त रहने वाला जो पार्थिव प्राण संश्लिष्ट सौर प्राणमण्डल है, वही अविच्छिन्न धारा के कारण अदिति कहलाता है। सूर्यपिता तथा पृथ्वीमाता है। अदिति का स्वरूप माता पृथ्वी के सम्बन्ध से निष्पन्न होता है। अतएव पार्थिव भाग ही अदिति माना गया है।
यह भाग है पूर्व कथित महावेदि स्वरूपा बहिर्वेदि जो कि सूर्य से भी आगे 22 अहर्गण तक है पार्थिव आग्नेय प्राण जो कि सौर प्राण से मिलकर अदिति कहा गया है। 22 अहर्गण पर्यन्त विस्तृत यह पार्थिव अग्नि तीन भागों में विभक्त है त्रिवृत, पंचदश, एकविंश, स्तोम भेद से यानि त्रिवृतस्तेाम, पंचदशस्तोम, एकविंशस्तोम, इन तीनो एक ही पार्थिव अग्नि के भिन्न-भिन्न अवस्था विशेष विद्यमान हैं। त्रिवृत स्तोम में पार्थिव अग्नि ,अग्नि अवस्था है, पंचदशस्तोम में पार्थिव अग्नि, वायुरूप है। तथा एकविंश स्तोम में यह पार्थिव अग्नि आदित्याग्नि अवस्था में है। 8वसु, 11रूद्र व 12 आदित्य इन तीनों स्तोम के अधिदेवता हैं। ये सम्पूर्ण देवता ही विश्वेदेव कहलाते हैं। ये सब महापृथ्वी रूप अदिति में ही गर्भ धारण करते है, वहीं प्रतिष्ठित रहते हैं। इस अदिति से ही सब उत्पन्न हुए हैं इसीलिये श्रुति कहती हैः-
अदितिद्र्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिजर्नित्वम्।।
(2)पृथिवीमूला अदितिः– सूर्यमूला अदिति के उपरान्त अदिति का द्वितीय स्वरूप है, पृथिवीमूला अदिति। भूूमण्डल के दो विभाग है- दृष्यभाग और अदृष्य विभाग। जहाँ सूर्य की किरणें पड़ती हैं वह दृष्य भाग तथा जहाँ सूर्य की किरणें नहीं पड़ती व अदृष्य भाग। दृष्य भाग का नाम ही अदिति है, एवं अदृष्य भाग दिति है। इस प्रकार रात्रि में भी अदिति की सत्ता हो जाती है। यद्यपि सूर्यमूला अदिति का सम्बन्ध मात्र दिन से है। किन्तु पृथिवीमूला अदिति का रात्रि से भी सम्बन्ध है। क्यों कि रात्रि में दृष्य होता है। रात्रि में पृथ्वी के जिस भाग पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं वह अदिति है किन्तु इसके विपरीत रात्रि में सूर्य के न दिखाई देने से रात्रि में सूर्यमूला अदिति नहीं होती। सूर्यमूला अदिति 12 आदित्यों के साथ सूर्य से युक्त रहती है। इसके विपरीत पृथिवीमूला दृश्यकपाल रूप अदिति जो कि भूपिण्डात्मक है अपने आठपुलों के साथ ही सूर्य से युक्त होने का सामर्थ्य रखती है। पृथ्वी का पूलों के रूप में विभाजन करने पर इसके 16 पूल होते हैं। पृथ्वी एक बार में अपने 8 पूलों के साथ सूर्य से साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकती है। इसका कारण है कि पृथिवी अपने अक्ष पर घूमती हुई आगे बढ़ती है, तथा सूर्य द्वादश आदित्य प्राणों का धनात्मक स्वरूप है या द्वादश आदित्यप्राणों से घनीभूत हैं। ये 12 आदित्य अदिति पुत्र है। पूर्वक्षितिज पर सूर्योदय से पश्चिम क्षितिज पर्यन्त 7 आदित्य प्राण रहते है। पश्यन्ति सप्तमं सर्वे के अनुसार सामने का पश्चिम क्षितिजवाला आदित्य सातवाँ पड़ता है। आठवाँ स्वयं सूर्य है। सौरकाल इन आठ से ही युक्त है। अतः दिन में पृथिवी इन सातों से ही सूर्य के साथ युक्त होने में समर्थ होती है। इसी पृथिवीमूला अदिति के स्वरूप को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है।
वीवीवीअष्टौ पुत्रसो अदितिर्ये जातास्तन्वरि।
देवा उपप्प्रैत् सप्तभिः परा मार्तण्डमास्यत्।।
ऋक् 10/72/8/
पृथिवी का सम्पूर्ण वृत्त अदिति है। दिन भी अदिति है। रात्रि भी अदिति है। साथ ही सम्पूर्ण भूपिण्ड दिति भी है। दिन में आधा दृष्यभाग अदिति है। अदृष्य भाग दिति है। रात्रि में दिन का दृष्य भाग दिति है। अदृष्य भाग अदिति है। एक उदाहरण से इस पूरे प्रक्रम को समझा जा सकता है माना हम जिस भाग में रहते हैं उस भाग में दिन है अतः वह भाग अदिति है, तथा इसके विपरीत वाला भाग जहाँ सूर्य की किरणें नहीं पहुँचती वहाँ रात्रि होने के कारण दिति है। अब पृथ्वी के उसी दिन वाले भू-भाग पर जब रात्रि होती है तो उस रात्रि में हमारे दिन वाले दृष्यभाग के अदृष्य हो जाने के कारण हमारा वाला पृथ्वी का भू-भाग अब दिति है। इसी प्रकार पृथ्वी के जिस भाग में पूर्व में रात्रि होने कारण अदृश्यता व दिति स्वरूप विद्यमान था वह अदृश्य भाग हमारे यहाँ रात्रि होते हुये भी वहाँ सूर्य की किरणों की उपस्थिति के कारण दृश्य बनता हुआ अदिति कहलाता है। अतः कहा है-
इयं वै पृथिवी अदितिः- इयं ह्येव दितिः।
(3) नक्षत्रमूला अदितिः- तीसरी है नक्षत्रमूला अदिति, यही तीसरी अदिति कही गयी है। इसे समझने से पूर्व यहाँ यह समझना आवश्यक है कि क्रान्ति वृत्त किसे कहते है?
समाधान है कि पृथ्वी एक निष्चित मार्ग पर चलती हुई सूर्य के चारों ओर नित्य परिक्रमा करती है। इसी परिक्रमा मार्ग को क्रान्ति वृत्त कहा जाता है तथा यह वृत्त दीर्घवृत्ताकार का है।
जिस प्रकार पृथ्वी का सूर्य के चतुर्दिक् दीर्घवृत्ताकार परिभ्रमण मार्ग है, ठीक उसी प्रकार चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों ओर एक परिभ्रमण मार्ग है। इस चन्द्र परिभ्रमणवृत्त को दक्षवृत्त कहा गया है। दक्षवृत्त चन्द्रमा के सम्बन्ध से सोममय है। सौम्यप्राण स्त्री (योषा) कहे गए हैं। इस सेाम्य प्राण की स्थिति दक्ष मार्ग पर है। अतः इसीलिये पुराणों में वेद के विज्ञान को समझाते हुये इसे दक्ष की कन्या बताया गया है। इसके विपरीत वृषा प्राण यानि पुरूष प्राण हैं। जैसे सूर्य, चंद्र अरिष्टनेमि, धर्म, अंगिरा, कृशाश्वा, भार्गव आदि ये देवताप्राण हैं, ऋषिप्राण हैं, इस दक्षवृत्त के जिस पर योषा प्राण स्थित है उसके 60 स्वरूप प्रकट होते हैं। 60 रूप में प्रकट होने वाले योषा स्त्री प्राणों के साथ सम्बन्ध होता है। पुराणों की भाषा में इस दिव्य ज्ञान को सहज ही समझाया गया है कि दक्ष की 60 कन्याएँ थीं जिनका विभिन्न देवताओं व ऋषियों से विवाह हुआ। वस्तुतः पुराणों में वर्णित वह चर्चा स्पष्ट रूप से भूलोक व अन्तरिक्षलोक का इतिवृत्त है। जो घटना अन्तरिक्ष में अदृश्य प्राणात्मक शक्तियों द्वारा हुई उसी का निदर्शन आदर्श रूप में प्रस्तुत करने हेतु उन प्राणशक्तियों द्वारा ही दिव्य देह धारण की गई तथा उस अन्तरिक्ष्य शक्ति प्रक्रिया की भौतिक रूप में प्रतिकृति हुई, इसका ही उल्लेख हमें पुराणों में मिलता है। चन्द्रमा का परिभ्रमण वृत्त दक्षवृत्त जिस पर सौम्य योषा प्राण अवस्थित है उसके 60 भाग एक ही प्रकार से नहीं हुए अपितु भिन्न2 प्रकारसे हुए। दक्षवृत्त पर स्थित प्राण के 27 भाग हुए तथा 27 भागों का समुच्चय चन्द्र पत्नि बना पुनः उस प्राणात्मक शक्ति ने स्वयं चार भागों में बाँटा तब उसके साथ अरिष्टनेमि का विवाह हुआ। दक्षवृत्त द्विधा विभक्त होकर नये योषा प्राणात्मक स्वरूप में प्रकट हुआ, तब उन देानों का सम्बन्ध अंगिरा से हुआ। धर्म के सम्बन्ध में 10 विभाग हुए। भार्गव के सम्बन्ध में 2 विभाग हुए। मलिम्लुच(अधिकमास) के सम्बन्ध से सौर सम्वत्सर के 13 विभाग हो जाते अतः सूर्य का सम्बन्ध 16 से है।
सूर्य कश्यपरूप में परिणीत होकर ही प्रजा का निर्माण करता है। सूर्य से निकलकर त्रैलोक्य में फैलने वाला सौरप्राण जो जीव की उत्पत्ति में सर्वथा प्रमुख है वह ही कश्यप कहलाता है। तथा सूर्यरश्मियाँ मरीचि नाम से प्रसिद्ध है। इन मरीचियों में परस्पर घर्षण होता है। ये मरीचियाँ अग्निमयीं हैं। अग्नेरापः अग्नि ही जल है, इस सिद्धान्त से इस आग्नेय घर्षण यानि मरीचियों के घर्षण से पानी उत्पन्न हो जाता है। यह पानी रूद्रवायु के सम्पर्क से घनभाव अर्थात् ठोस में बदलता है। जैसे दूध अत्यधिक ताप से तथा ऊपर हवा लगने के कारण ऊपरी भाग में जमकर मलाई बनता है। इसे वेद विज्ञान की तकनीकी भाषा में कहा जायेगा कि दूध का द्रवभाग और बाहर की वायु दोनों प्रतिमूर्छित होकर अर्थात् आपस में एक दूसरे से मिलकर अलग नहीं होकर एक ही साथ स्थित रही ऐसी स्थिति होकर वे घन बन जाते है। इसी प्रकार सूर्य से उत्पन्न मरीचियों के घर्षण से उत्पन्न पानी और आन्तरिक्ष्य वायु दोनों प्रतिमूर्छित होकर घन बन जाते है। इसे अपांशर कहा जाता है।
पुनः यदि दूध को और अधिक अग्नि दी जाय तो वह मावा बन जाता है। तथा पिण्डरूप धारण करता है। यही अवस्था यहाँ भी होती है। यही प्रक्रिया पृथ्वी निर्माण के सन्दर्भ में होती है कि आन्तरिक्ष्य एमूष वराह नामक वायु व सौर रश्मियों द्वारा इसका सम्पादन होता है। इसकी प्रक्रिया वेदविज्ञान की भाषा में इस प्रकार है की एमूषवराह की कृपा से आपोमय महासमुद्र में परमाणुरूप से यहाँ वहाँ बिखरे हुए पार्थिव परमाणुओं का संहनन होता है। यानि परस्पर टक्कर होती है, अतएव वे परमाणु आगे जाकर भूपिण्ड रूप में परिणत हो जाते हैं।
पृथ्वीपिण्ड यद्यपि मरीचि यानी पानी से बना है, परन्तु ठोस भाव अग्नि के कारण आया है। अग्नि की रूक्षता ने ही पानी को पिण्डरूप में परिवर्तीत किया है। जिससे पृथ्वी का निर्माण हुआ।
पूर्ववर्णित दक्षवृत्त पर स्थित सौम्यप्राण रूप दक्ष की 60 कन्याओं के कश्यप के साथ सम्बन्ध रखने वाली 13 दाक्षायणियों (दक्ष की पुत्रियाँ) में से अदिति नाम की स्थिर दाक्षायणि है। सम्पूर्ण प्रजा का प्रभव-प्रतिष्ठा-परायण-भूत कूर्मप्रजापति को सम्वत्सर प्रजापति कहते है। इस आदित्यात्मक सम्वत्सररूप कूर्मप्रजापति के 13 अवयव है। इसके सम्बन्ध में उस दक्षवृत्त के 13 विभाग हो जाते है। वे तेरहों ही देव, दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, मनुश्य, कीट, पशु, पक्षी, औषधि, वनस्पति, धातु, दिव, रस आदि आदि यच्चायावत् स्थावर जङ्गम् प्रजाओं की जननियाँ हैं। पिता सूर्य रूप कूर्म है। इसी आधार पर कहा हैः-
नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः
निश्चय ही सारी प्रजा सूर्य के द्वारा उत्पन्न है। यदि पूर्वोक्त सभी दाक्षायणियों का संकलन किया जाय तो इनके 60 विभाग हो जाते है। ये ही दक्षप्रजापति की 60 कन्याएँ हैं,जो कि तत्तत देवताओं, ऋषिप्राणों से संयुक्त होकर तत्तत प्रजा का निमार्ण करती हैं, यह है अधिदैविक चरित्र। इसी से अध्यात्मसृष्टि होती है। एवं इसी से अधिभूत सृष्टि होती है। अतएव यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार जो व्यवस्था अधिदैवत में है, वही अध्यात्म एवं वह ही अधिभूत में भी। इसी भूमण्डल पर आदित्यादि मनुष्य देवता थे। दक्ष प्रजापति थे उनकी 60 कन्याएँ थीं तथा उनको भूलोकस्थ देव ऋषियों से विवाह हुआ। पुराण का श्लोक है।
दक्षस्तु षष्टि कन्यास्तु सप्तविंशतिमिन्दवे।
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।।1।।
द्वे चैवाङ्गिरसे प्रदाद् द्वे कशाष्याय धीमते।
द्वे चैव भृगुपुत्राय चतस्रोऽरिष्टनेमिने इति।।2।।
इस प्रकार सम्वत्सर के 13 विभाग सर्वथा नियत हैं। इनमें एक विभाग दिति है। एवं एक अदिति है। सम्वत्सर प्रजापति का दिति के साथ संयोग होने से यज्ञ विरोधी दैत्य उत्पन्न होते है, तथा अदिति के साथ संयोग से यज्ञमूलक आदित्य उत्पन्न होते हैं, जो कि बुद्धिमान् हैं, ज्योतिर्धन है, सत्यानुयायी है, आधे खगोल में देवताओं का राज्य हैं, इस खगोल मण्डल को यज्ञीय मण्डल कहा गया है। एक ओर स्वाती नक्षत्र है दूसरी ओर अश्विनी नक्षत्र है। और रेवती नक्षत्र दोनों के मध्य की बिन्दू है। आकाश का यह प्रदेश ही अदिति है। इस स्थान पर पुनर्वसु नक्षत्र है। पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण पर ही अदिति बिन्दू है। पूर्व में स्वाती नक्षत्र पर्यन्त इसकी व्याप्ति है। पश्चिम में अश्विनी, रेवती नक्षत्र की मध्य बिन्दू पर्यन्त इसकी स्थिति है।

इस देवमण्डल में स्वाती से रेवती पर्यन्त 13 नक्षत्रों का भोग है। जिसे नक्षत्र अदिति कहा । 

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

दिव्य शिवलिंग है, हमारा अंगूठा ..........

दिव्य शिवलिंग है हमारा अपना अंगूठा ..........

जब हम अपनी चार उंगलिओं को मोड़ कर अंगूठा ऊपर करते हैं तब हमारा अंगूठा एक शिव लिंग का आकार ले लेता है . यही है हमारे शरीर में हमारा साथ सदा रहने वाला शिव लिंग. यदि आपको कहीं मंदिर में कोई शिव लिंग उपलब्ध नही हो पाता है तो आप अपने अंगूठे पर ही जलाभिषेक करके भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं .
अंगूठे का नाखून शिव लिंग के साथ में चन्द्र का प्रतीक है। अंगूठे पर बनी तीन मोटी रेखाएं प्राकृतिक रूप से इस शिवलिंग को तिलक करती हैं. नाखून के पीछे की रेखाएं (जिनका प्रयोग फिंगर प्रिंट के लिए होता है ) वो भगवान शिव की जटाएं हैं . हर व्यक्ति के अंगूठे रूपी शिव लिंग में ये जटाएं एक अलग तरह की होती हैं. बिना अंगूठे के प्रयोग के आप केवल अपनी बाक़ी चार उँगलियों से कोई बड़ा कार्य जैसे भार उठाना, लिखना आदि नही कर सकते क्योंकि आप बिना शिवजी की सहायता के कुछ नही कर सकते.

अंगूठे से तिलक करने से आपको भगवान शिव का आशीर्वाद स्वतः मिल जाता है .

शिवलिंग मुद्रा.........

बाएं हाथ को पेट के पास लाकर सीधा रखें। दाएं हाथ की मुठ्ठी बना कर बाईं हथेली पर रखें और दाएं हाथ का अंगूठा सीधा ऊपर की ओर रखें। नीचे वाले बाएं हाथ की अंगुलियाँ और अंगूठा मिला कर रखें। दोनों बाजुओं की कोहनियाँ सीधी रखें। इस मुद्रा को शिवलिंग मुद्रा कहते हैं।

शिवलिंग मुद्रा दिन में दो बार पाँच मिनट के लिए लगाएं।

लाभ .............

 शिवलिंग मुद्रा लगाने से सुस्ती, थकावट दूर हो नयी शक्ति का विकास होता है।
 शिवलिंग मुद्रा लगाते हुए लम्बे व गहरे सांस लेने चाहिये।
 शिवलिंग मुद्रा लगाने से मानसिक थकान व चिंता दूर होती है।

हाथ की उंगलियों में पंच तत्व का वास.........
हमारे हाथ की उंगलियों में पंच तत्व का वास है। हमारे अंगुष्ठ में आकाश, तर्जनी में वायु, मध्यमा में अग्नि, अनामिका में जल एवं कनिष्ठा में पृथ्वी तत्व स्थित है।भोजन हाथ से ही करें, कटलरी से नहीं.....
हमारी उंगलियों को ऋषि स्वरूप एवं हमारे भोजन को देवी स्वरूप माना जाता है। जब हम भोजन हाथ से करते हैं, तो  ऋषि हमारे भोजन को मुंह तक ले जाते हैं, जिससे हम जीवित रहते हैं। अतः भोजन साफ-सुथरे हाथ से ही करें, कटलरी से नहीं। भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण करेंगे तो उसका अच्छा असर हमारे शरीर, मन और बुद्धि तक होगा । 
कटलरी अर्थात चाकू, छूरी, कांटे से भोजन को काटना, फाड़ना एवं छेदना क्या असभ्यता की निशानी नहीं है ?

शनिवार, 15 नवंबर 2025

भारत की खोज

★★★कौन कहता है कि भारत की खोज वास्को डी गामा ने की ,क्यों पढ़ाया जाता है फर्जी इतिहास।★★★

√●भारतवर्ष को अंग्रेजों ने नहीं खोजा था, यह सनातन है और इसके साक्ष्य भी हैं

√●इतिहास हमेशा विजित द्वारा लिखा जाता है और वह इतिहास नहीं विजित की गाथा होती है। भारत के साथ भी यही हुआ है पहले इस्लामिक आक्रमण और 800 वर्षों शासन और फिर अंग्रेज़ो के 200 वर्ष तक के शासन ने इस देश के इतिहास लेखन को इस तरह से प्रभावित किया कि आज भी लोगों को यही लगता है कि India को ब्रिटिश ने बनाया। लोगों के मन में यह हिन भावना बैठी हुई है कि ब्रिटिश के आने से पहले भारत या India था ही नहीं। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अभिनेता और अपने आप को ‘History_Buff’ कहने वाले सैफ अली खान ने ये कह दिया कि मुझे नहीं लगता है India जैसा कोई कान्सैप्ट ब्रिटिश के आने से पहले था के नहीं। यह कोई हैरानी की बात नहीं है। पिछले 70 वर्षों में जिस तरह से इतिहास को उसी इस्लामिक और ब्रिटिश को केंद्र में रख कर पढ़ाया गया है ये उसी का परिणाम है। ब्रिटिश काल के इतिहासकारों ने अपने हिसाब से ही इतिहास लिखा जैसा एक विजित लिखता है यानि अपने ही गुणगान में। उनके द्वारा किताबों में यह जानबूझकर लिखा गया जिससे पढ़ने वालों को यह लगे कि उनके आने से पहले भारत नाम का कोई देश ही नहीं था और जो भी बनाया गया वह सिर्फ और सिर्फ ब्रिटिशर्स की देन है। उनके बाद हमारे देश के चाटुकार इतिहासकारों ने भी उसी को आधार बनाकर उनका गुणगान किया। इस वजह से आज हमारे देश में जो भी इतिहास पढ़ाया जाता है उसे पढ़ कर यही भावना आती है कि ब्रिटिश के आने से पहले भारत या India था ही नहीं।

√●भारत कोई 70 वर्ष पुराना देश नहीं है। यह हजारों वर्षों पुरानी एक सभ्यता है जिसकी पहचान भौगोलिक अवस्थिति से होती है। भारत के रहने वाले इतने पुराने है कि इसे सनातन यानि जो सदा से यानि अविरल समय से चला आ रहा है।

विष्णु पुराण में स्पष्ट लिखा है:

"उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं।
वर्ष तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।"

√●इसका अर्थ यह है कि “समुद्र के उत्तर से ले कर हिमालय के दक्षिण में जो देश है वही भारत है और यहाँ के लोग भारतीय हैं”

√●सबसे पहले बात करते हैं पृथ्वी के भूगोल यानि ज्योग्राफी की। आज हमे वर्तमान की ज्योग्राफी में यह पढ़ाया जाता है कि पैंजिया पृथ्वी का पहला महाद्वीप या यूं कहे सुपर महाद्वीप था। अन्य सभी नवीन महाद्वीप (एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, यूरोप, अंटार्कटिका एवं ऑस्ट्रेलिया) का जन्मदाता भी यही महाद्वीप है। टेकटोनिक प्लेट्स के movement के कारण पैंजिया महाद्वीप में खंडन हुआ और यह टूटकर इन 7 महाद्वीपों में बंट गया।

√●गोंडवाना पैंजिया के दक्षिणी भाग को कहते हैं। गोंडवाना भूमि में प्रायद्वीप भारत, दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका और अंटार्कटिका समाहित है। अंगारा पैंजिया के उत्तरी भाग को कहते हैं। अंगारा भूमि में एशिया (प्रायद्वीपीय भारत को छोड़कर), उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप समाहित है।

√●अब देखते है कि हमारे वेद-पुराणों में क्या लिखा है।

√●मत्स्यमहापुराण में सभी सात प्रधान महाद्वीपों के बारे में बताया गया है। सात द्वीपों में जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप,शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंच द्वीप, शाकद्वीप तथा पुष्करद्वीप का वर्णन है। जम्बूद्वीप का विस्तार से भौगोलिक वर्णन है। आज जिसे एशिया कहा जाता है वही जम्बूद्वीप के नाम से जाना जाता था।

√●जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बू द्वीप का विस्तार एक लाख योजन है। जम्बू (जामुन) नामक वृक्ष की इस द्वीप पर अधिकता के कारण इस द्वीप का नाम जम्बू द्वीप रखा गया था।

"जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंपुरुषं स्मृतम्‌,
हरिवर्षं तथैवान्यन्‌मेरोर्दक्षिणतो द्विज।
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्‌,
उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्‌,
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।
एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।"
         (विष्णु पुराण)

√●भारतवर्ष का अर्थ है राजा भरत का क्षेत्र और इन्ही राजा भरत के पुत्र का नाम सुमति था ! इस विषय में वायु पुराण कहता है—

"सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरंनृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत।"

√●ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को ‘सप्तसिंधु’ प्रदेश कहा गया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त (10.75) में आर्य निवास में प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन मिलता है, जो मुख्‍य हैं:- कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी (रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा। उक्त संपूर्ण नदियों के आसपास और इसके विस्तार क्षेत्र तक आर्य रहते थे। इसके अलावा महाभारत में पृथ्वी का वर्णन आता है।

"सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।"
    (वेदव्यास, भीष्म पर्व, महाभारत)

√●हिन्दी अर्थ : हे कुरुनन्दन! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भांति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों में पिप्पल और दो अंशों में महान शश (खरगोश) दिखाई देता है।

√●अर्थात : दो अंशों में पिप्पल का अर्थ पीपल के दो पत्तों और दो अंशों में शश अर्थात खरगोश की आकृति के समान दिखाई देता है। आप कागज पर पीपल के दो पत्तों और दो खरगोश की आकृति बनाइए और फिर उसे उल्टा करके देखिए, आपको धरती का मानचित्र दिखाई देखा।

√●ब्रह्म पुराण, अध्याय 18 में जम्बूद्वीप के महान होने का प्रतिपादन है-

"तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन।।
दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्॥ 21॥
पुरुषैयज्ञ पुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते।।
यज्ञोर्यज्ञमयोविष्णु रम्य द्वीपेसु चान्यथा॥ 22॥
अत्रापि भारतश्रेष्ठ जम्बूद्वीपे महामुने।।
यतो कर्म भूरेषा यधाऽन्या भोग भूमयः॥23॥"

√●अर्थात भारत भूमि में लोग तपश्चर्या करते हैं, यज्ञ करने वाले हवन करते हैं तथा परलोक के लिए आदरपूर्वक दान भी देते हैं। जम्बूद्वीप में सत्पुरुषों के द्वारा यज्ञ भगवान् का यजन हुआ करता है। यज्ञों के कारण यज्ञ पुरुष भगवान् जम्बूद्वीप में ही निवास करते हैं। इस जम्बूद्वीप में भारतवर्ष श्रेष्ठ है। यज्ञों की प्रधानता के कारण इसे (भारत को) को कर्मभूमि तथा और अन्य द्वीपों को भोग- भूमि कहते हैं।

√●इसी तरह अगर शक्तिपीठों का भौगोलिक स्थिति देखे तो वे बलूचिस्तान से लेकर त्रिपुरा, कश्मीर से कन्याकुमारी / जाफना तक फैले हुए हैं। यह एक बनावटी स्थिति नहीं है।

√●इतना ही नहीं जब हम अपने घरों में पुजा अर्चना के दौरान संकल्प लेते है तो उस दौरान प्रयोग में लाया जाने वाला मंत्र भी यही कहता है, जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते। इस पंक्ति में मनुष्य के रहने के स्थान तथा उसके बारे में जानकारी दी जाती है जो पूजा करा रहा है।

√●इससे स्पष्ट होता है कि भारत भूमि 70 वर्ष पहले नहीं बल्कि हजारों वर्ष पुरानी है। अंग्रेजों ने 1947 में इसी भूमि को 2 टुकड़ों में बाँट दिया था जिससे सभी को यह लगता है कि अंग्रेजों ने भारत को बनाया। आधिकारिक तौर भारत का नाम “भारत गणराज्य” या “रिपब्लिक ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है। संविधान के अनुच्छेद 1(1) में स्पष्ट लिखा है कि India, that is Bharat, shall be a Union of States. यह एक मात्र ऐसा अनुच्छेद है जो भारत के नाम के बारे में उल्लेख करता है। इसी तरह 13 वीं शताब्दी के बाद, “हिंदुस्तान” शब्द का प्रयोग भारत के लिए एक लोकप्रिय वैकल्पिक नाम के रूप में किया जाने लगा, जिसका अर्थ है “हिंदुओं की भूमि”। लेकिन जितने भी आक्रमणकारी भारत आए सभी एक अलग संस्कृति से थे इसलिए उन्होंने हमारी सनातन संस्कृति को “हिन्दू धर्म” कहने लगे। तब से इस सनातन धर्म को हिन्दू धर्म के रूप में प्रचारित किया जाने लगा। वास्तविकता देखें तो पता चलता है कि जो भी सिंधु नदी के पार रहते हैं वे सभी हिन्दू हैं और ये कोई संप्रदाय नहीं है। अंगेज़ों ने जो लिखा वही लगातार पढ़ाये जाने आए यह बात भारत के लोगों के मन में कि भारत को अंग्रेजों ने बानया है। अब लोगों को इन कपोलकल्पित इतिहास से ऊपर उठ कर वास्तविकता को जानना चाहिए और अपने महान मातृभूमि पे गर्व करना चाहिए।

√●शास्त्रीय विद्वान आदरणीय Arun Upadhyay जी द्वारा की गई टिप्पणी से विषय वस्तु स्पष्ट हो जाती है, उनकी टिप्पणी के माध्यम से प्राप्त जानकारी निम्नानुसार प्रस्तुत है:

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√●आकाश में सृष्टि के ५ पर्व हैं-१०० अरब ब्रह्माण्डों का स्वयम्भू मण्डल, १०० अरब तारों का हमारा ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल, चन्द्रमण्डल (चन्द्रकक्षा का गोल) तथा पृथ्वी। किन्तु लोक ७ हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (नेपचून तक के ग्रह) स्वः (सौरमण्डल १५७ कोटि व्यास, अर्थात् पृथ्वी व्यास को ३० बार २ गुणा करने पर), महः (आकाशगंगा की सर्पिल भुजा में सूर्य के चतुर्दिक् भुजा की मोटाई के बराबर गोला जिसके १००० तारों को शेषनाग का १००० सिर कहते हैं), जनः (ब्रह्माण्ड), तपः लोक (दृश्य जगत्) तथा अनन्त सत्य लोक।

√●इसी के अनुरूप पृथ्वी पर भी ७ तल तथा ७ लोक हैं। उत्तरी गोलार्द्ध का नक्शा (नक्षत्र देख कर बनता है, अतः नक्शा) ४ भागों में बनता था। इसके ४ रंगों को मेरु के ४ पार्श्वों का रंग कहा गया है। ९०°-९०° अंश देशान्तर के विषुव वृत्त से ध्रुव तक के ४ खण्डों में मुख्य है भारत, पश्चिम में केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व, तथा विपरीत दिशा में उत्तर कुरु। इनको पुराणों में भूपद्म के ४ पटल कहा गया है।

√●ब्रह्मा के काल (२९१०२ ई.पू.) में इनके ४ नगर परस्पर ९०° अंश देशान्तर दूरी पर थे-पूर्व भारत में इन्द्र की अमरावती, पश्चिम में यम की संयमनी (यमन, अम्मान, सना), पूर्व में वरुण की सुखा तथा विपरीत में चन्द्र की विभावरी। वैवस्वत मनु काल के सन्दर्भ नगर थे, शून्य अंश पर लंका (लंका नष्ट होने पर उसी देशान्तर रेखा पर उज्जैन), पश्चिम में रोमकपत्तन, पूर्व में यमकोटिपत्तन तथा विपरीत दिशा में सिद्धपुर।

√●दक्षिणी गोलार्द्ध में भी इन खण्डों के ठीक दक्षिण ४ भाग थे। अतः पृथ्वी अष्ट-दल कमल थी, अर्थात् ८ समतल नक्शे में पूरी पृथ्वी का मानचित्र होता था। गोल पृथ्वी का समतल नक्शा बनाने पर ध्रुव दिशा में आकार बढ़ता जाता है और ठीक ध्रुव पर अनन्त हो जायेगा। उत्तरी ध्रुव जल भाग में है (आर्यभट आदि) अतः वहां कोई समस्या नहीं है। पर दक्षिणी ध्रुव में २ भूखण्ड हैं-जोड़ा होने के कारण इसे यमल या यम भूमि भी कहते हैं और यम को दक्षिण दिशा का स्वामी कहा गया है। इसका ८ भाग के नक्शे में अनन्त आकार हो जायेगा अतः इसे अनन्त द्वीप (अण्टार्कटिका) कहते थे। ८ नक्शों से बचे भाग के कारण यह शेष है।

√●विष्णु पुराण (२/८)-

"मानसोत्तर शैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी।
दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वारुणस्य च। उत्तरेण च सोमस्य तासां नामानि मे शृणु॥८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमनी तथा। पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी।९।
शक्रादीनां पुरे तिष्ठन्स्पृशत्येष पुर त्रयम्। विकोणौ द्वौ विकोणस्थस्त्रीन् कोणान् द्वे पुरे तथा।॥१६॥
उदितो वर्द्धमानाभिरामध्याह्नात्तपन् रविः। ततः परं ह्रसन्ती भिर्गोभिरस्तं नियच्छति॥१७॥
एवं पुष्कर मध्येन यदा याति दिवाकरः। त्रिंशद्भागं तु मेदिन्याः तदा मौहूर्तिकी गतिः।२६॥
सूर्यो द्वादशभिः शैघ्र्यान् मुहूर्तैर्दक्षिणायने। त्रयोदशार्द्धमृक्षाणामह्ना तु चरति द्विज।
मुहूर्तैस्तावद् ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्॥३४॥'

√●सूर्य सिद्धान्त (१२/३८-४२)-
"भू-वृत्त-पादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता। भद्राश्व वर्षे नगरी स्वर्ण प्राकार तोरणा॥३८॥
याम्यायां भारते वर्षे लङ्का तद्वन् महापुरी। पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीर्तिता॥३९॥
उदक् सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्तिता (४०) भू-वृत्त-पाद विवरास्ताश्चान्योऽन्यं प्रतिष्ठिता (४१)
तासामुपरिगो याति विषुवस्थो दिवाकरः। नतासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते॥४२॥"

√●भारत भाग में आकाश के ७ लोकों की तरह ७ लोक थे। बाकी ७ खण्ड ७ तल थे-अतल, सुतल, वितल, तलातल, महातल, पाताल, रसातल। अतल = भारत के पश्चिम उत्तर गोल। तलातल = अतल के तल या दक्षिण में।

√●सुतल = भारत के पूर्व, उत्तर में। वितल = सुतल के दक्षिण।

√●पाताल = सुतल के पूर्व, भारत के विपरीत, उत्तर गोल। रसातल = पाताल के दक्षिण (उत्तर और दक्षिण अमेरिका मुख्यतः)

√●महातल = भारत के दक्षिण, कुमारिका खण्ड समुद्र।

√●विष्णु पुराण (२/५)-
"दशसाहस्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम।
अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत्। महाख्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम्॥२॥
शुक्लकृष्णाख्याः पीताः शर्कराः शैल काञ्चनाः। भूमयो यत्र मैत्रेय वरप्रासादमण्डिताः॥३॥
पातालानामधश्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः। शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्यदानवाः॥१३॥
योऽनन्तः पठ्यते सिद्धैर्देवो देवर्षि पूजितः। स सहस्रशिरा व्यक्तस्वस्तिकामलभूषणः॥१४॥
नीलवासा मदोत्सिक्तः श्वेतहारोपशोभितः। साभ्रगङ्गाप्रवाहोऽसौ कैलासाद्रिरिवापरः॥१७॥
कल्पान्ते यस्य वक्त्रेभ्यो विषानलशिखोज्ज्वलः। सङ्कर्षणात्मको रुद्रो निष्क्रामयात्ति जगत्त्रयम्॥१९॥
यस्यैषा सकला पृथ्वी फणामणिशिखारुणा। आस्ते कुसुममालेव कस्तद्वीर्यं वदिष्यति॥२२॥"

√●ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२०)-
"परस्परैः सोपचिता भूमिश्चैव निबोधत॥९॥
स्थितिरेषा तु विख्याता सप्तमेऽस्मिन् रसातले। दशयोजन साहस्रमेकं भौमं रसातलम्॥१०॥
प्रथमः तत्वलं नाम सुतलं तु ततः परम्॥११॥
ततस्तलातलं विद्यादतलं बहुविस्तृतम्। ततोऽर्वाक् च तलं नाम परतश्च रसातलम्॥१२॥
एतेषमप्यधो भागे पातालं सप्तमं स्मृतम्।"

√●भागवत पुराण (५/२४/७)- 
"उपवर्णितं भूमेर्यथा संनिवेशावस्थानं अवनेरत्यधस्तात् सप्त भूविवरा एकैकशो योजनायुतान्तरेणायामं विस्तारेणोपक्लृप्ता-अतलं वितलं सुतलं तलातलं महातलं रसातलं पातालमिति॥७॥"

√●भागवत पुराण (५/२५)-
"अस्य मूलदेशे त्रिंशद् योजन सहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी
समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृ दृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्ष्यते॥१॥
यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षाणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥"

√●वास्तविक भूखण्डों के हिसाब से ७ द्वीप थे-जम्बू (एसिया), शक (अंग द्वीप, आस्ट्रेलिया), कुश (उत्तर अफ्रीका), शाल्मलि (विषुव के दक्षिण अफ्रीका), प्लक्ष (यूरोप), क्रौञ्च (उत्तर अमेरिका), पुष्कर (दक्षिण अमेरिका)। इनके विभाजक ७ समुद्र हैं।

√●यह ऐतिहासिक पौराणिक लेख तीन विद्वानों द्वारा प्राचीन वाग्मय के आधार पर लिखा गया है संशोधित किया गया है जो प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों को प्रदर्शित करता है।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

बिल्वपत्र चढ़ाने के 108 मन्त्र

।।बिल्वपत्र चढाने के 108मन्त्र।। 

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।
त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१॥
त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।
तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२॥
सर्वत्रैलोक्यकर्तारं सर्वत्रैलोक्यपालनम् ।
सर्वत्रैलोक्यहर्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३॥
नागाधिराजवलयं नागहारेण भूषितम् ।
नागकुण्डलसंयुक्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४॥
अक्षमालाधरं रुद्रं पार्वतीप्रियवल्लभम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५॥
त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गादेहार्धधारिणम् ।
विभूत्यभ्यर्चितं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६॥
त्रिशूलधारिणं देवं नागाभरणसुन्दरम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७॥
गङ्गाधराम्बिकानाथं फणिकुण्डलमण्डितम् ।
कालकालं गिरीशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८॥
शुद्धस्फटिक सङ्काशं शितिकण्ठं कृपानिधिम् ।
सर्वेश्वरं सदाशान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९॥
सच्चिदानन्दरूपं च परानन्दमयं शिवम् ।
वागीश्वरं चिदाकाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०॥
शिपिविष्टं सहस्राक्षं कैलासाचलवासिनम् ।
हिरण्यबाहुं सेनान्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥११॥
अरुणं वामनं तारं वास्तव्यं चैव वास्तवम् ।
ज्येष्टं कनिष्ठं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१२॥
हरिकेशं सनन्दीशं उच्चैर्घोषं सनातनम् ।
अघोररूपकं कुम्भं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१३॥
पूर्वजावरजं याम्यं सूक्ष्मं तस्करनायकम् ।
नीलकण्ठं जघन्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१४॥
सुराश्रयं विषहरं वर्मिणं च वरूधिनम् I
महासेनं महावीरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१५॥
कुमारं कुशलं कूप्यं वदान्यञ्च महारथम् ।
तौर्यातौर्यं च देव्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१६॥
दशकर्णं ललाटाक्षं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम् ।
अशेषपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१७॥
नीलकण्ठं जगद्वन्द्यं दीननाथं महेश्वरम् ।
महापापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१८॥
चूडामणीकृतविभुं वलयीकृतवासुकिम् ।
कैलासवासिनं भीमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१९॥
कर्पूरकुन्दधवलं नरकार्णवतारकम् ।
करुणामृतसिन्धुं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२०॥
महादेवं महात्मानं भुजङ्गाधिपकङ्कणम् ।
महापापहरं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२१॥
भूतेशं खण्डपरशुं वामदेवं पिनाकिनम् ।
वामे शक्तिधरं श्रेष्ठं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२२॥
फालेक्षणं विरूपाक्षं श्रीकण्ठं भक्तवत्सलम् ।
नीललोहितखट्वाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥२३॥
कैलासवासिनं भीमं कठोरं त्रिपुरान्तकम् ।
वृषाङ्कं वृषभारूढं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२४॥
सामप्रियं सर्वमयं भस्मोद्धूलितविग्रहम् ।
मृत्युञ्जयं लोकनाथं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२५॥
दारिद्र्यदुःखहरणं रविचन्द्रानलेक्षणम् ।
मृगपाणिं चन्द्रमौळिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२६॥
सर्वलोकभयाकारं सर्वलोकैकसाक्षिणम् ।
निर्मलं निर्गुणाकारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२७॥
सर्वतत्त्वात्मकं साम्बं सर्वतत्त्वविदूरकम् ।
सर्वतत्त्वस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२८॥
सर्वलोकगुरुं स्थाणुं सर्वलोकवरप्रदम् ।
सर्वलोकैकनेत्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II२९॥
मन्मथोद्धरणं शैवं भवभर्गं परात्मकम् ।
कमलाप्रियपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३०॥
तेजोमयं महाभीमं उमेशं भस्मलेपनम् ।
भवरोगविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३१॥
स्वर्गापवर्गफलदं रघुनाथवरप्रदम् ।
नगराजसुताकान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३२॥
मञ्जीरपादयुगलं शुभलक्षणलक्षितम् ।
फणिराजविराजं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३३॥
निरामयं निराधारं निस्सङ्गं निष्प्रपञ्चकम् ।
तेजोरूपं महारौद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३४॥
सर्वलोकैकपितरं सर्वलोकैकमातरम् ।
सर्वलोकैकनाथं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३५॥
चित्राम्बरं निराभासं वृषभेश्वरवाहनम् ।
नीलग्रीवं चतुर्वक्त्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३६॥
रत्नकञ्चुकरत्नेशं रत्नकुण्डलमण्डितम् ।
नवरत्नकिरीटं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३७॥
दिव्यरत्नाङ्गुलीस्वर्णं कण्ठाभरणभूषितम् ।
नानारत्नमणिमयं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३८॥
रत्नाङ्गुलीयविलसत्करशाखानखप्रभम् ।
भक्तमानसगेहं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३९॥
वामाङ्गभागविलसदम्बिकावीक्षणप्रियम् ।
पुण्डरीकनिभाक्षं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४०॥
सम्पूर्णकामदं सौख्यं भक्तेष्टफलकारणम् ।
सौभाग्यदं हितकरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४१॥
नानाशास्त्रगुणोपेतं स्फुरन्मङ्गल विग्रहम् ।
विद्याविभेदरहितं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४२॥
अप्रमेयगुणाधारं वेदकृद्रूपविग्रहम् ।
धर्माधर्मप्रवृत्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४३॥
गौरीविलाससदनं जीवजीवपितामहम् ।
कल्पान्तभैरवं शुभ्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४४॥
सुखदं सुखनाशं च दुःखदं दुःखनाशनम् ।
दुःखावतारं भद्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४५॥
सुखरूपं रूपनाशं सर्वधर्मफलप्रदम् ।
अतीन्द्रियं महामायं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४६॥
सर्वपक्षिमृगाकारं सर्वपक्षिमृगाधिपम् ।
सर्वपक्षिमृगाधारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४७॥
जीवाध्यक्षं जीववन्द्यं जीवजीवनरक्षकम् ।
जीवकृज्जीवहरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४८॥
विश्वात्मानं विश्ववन्द्यं वज्रात्मावज्रहस्तकम् ।
वज्रेशं वज्रभूषं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४९॥
गणाधिपं गणाध्यक्षं प्रलयानलनाशकम् ।
जितेन्द्रियं वीरभद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५०॥
त्र्यम्बकं मृडं शूरं अरिषड्वर्गनाशनम् ।
दिगम्बरं क्षोभनाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५१॥
कुन्देन्दुशङ्खधवलं भगनेत्रभिदुज्ज्वलम् ।
कालाग्निरुद्रं सर्वज्ञं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५२॥
कम्बुग्रीवं कम्बुकण्ठं धैर्यदं धैर्यवर्धकम् ।
शार्दूलचर्मवसनं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५३॥
जगदुत्पत्तिहेतुं च जगत्प्रलयकारणम् ।
पूर्णानन्दस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५४॥
सर्गकेशं महत्तेजं पुण्यश्रवणकीर्तनम् ।
ब्रह्माण्डनायकं तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५५॥
मन्दारमूलनिलयं मन्दारकुसुमप्रियम् ।
बृन्दारकप्रियतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५६॥
महेन्द्रियं महाबाहुं विश्वासपरिपूरकम् ।
सुलभासुलभं लभ्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ ५७॥
बीजाधारं बीजरूपं निर्बीजं बीजवृद्धिदम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५८॥
युगाकारं युगाधीशं युगकृद्युगनाशनम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५९॥
धूर्जटिं पिङ्गलजटं जटामण्डलमण्डितम् ।
कर्पूरगौरं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६०॥
सुरावासं जनावासं योगीशं योगिपुङ्गवम् ।
योगदं योगिनां सिंहं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६१॥
उत्तमानुत्तमं तत्त्वं अन्धकासुरसूदनम् ।
भक्तकल्पद्रुमस्तोमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६२॥
विचित्रमाल्यवसनं दिव्यचन्दनचर्चितम् ।
विष्णुब्रह्मादि वन्द्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥६३॥
कुमारं पितरं देवं श्रितचन्द्रकलानिधिम् ।
ब्रह्मशत्रुं जगन्मित्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६४॥
लावण्यमधुराकारं करुणारसवारधिम् ।
भ्रुवोर्मध्ये सहस्रार्चिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६५॥
जटाधरं पावकाक्षं वृक्षेशं भूमिनायकम् ।
कामदं सर्वदागम्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६६॥
शिवं शान्तं उमानाथं महाध्यानपरायणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६७॥
वासुक्युरगहारं च लोकानुग्रहकारणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६८॥
शशाङ्कधारिणं भर्गं सर्वलोकैकशङ्करम् I
शुद्धं च शाश्वतं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६९॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणम् ।
गम्भीरं च वषट्कारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७०॥
भोक्तारं भोजनं भोज्यं जेतारं जितमानसम् I
करणं कारणं जिष्णुं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७१॥
क्षेत्रज्ञं क्षेत्रपालञ्च परार्धैकप्रयोजनम् ।
व्योमकेशं भीमवेषं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७२॥
भवज्ञं तरुणोपेतं चोरिष्टं यमनाशनम् ।
हिरण्यगर्भं हेमाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७३॥
दक्षं चामुण्डजनकं मोक्षदं मोक्षनायकम् ।
हिरण्यदं हेमरूपं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७४॥
महाश्मशाननिलयं प्रच्छन्नस्फटिकप्रभम् ।
वेदास्यं वेदरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७५॥
स्थिरं धर्मं उमानाथं ब्रह्मण्यं चाश्रयं विभुम् I
जगन्निवासं प्रथममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७६॥
रुद्राक्षमालाभरणं रुद्राक्षप्रियवत्सलम् ।
रुद्राक्षभक्तसंस्तोममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७७॥
फणीन्द्रविलसत्कण्ठं भुजङ्गाभरणप्रियम् I
दक्षाध्वरविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७८॥
नागेन्द्रविलसत्कर्णं महीन्द्रवलयावृतम् ।
मुनिवन्द्यं मुनिश्रेष्ठमेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७९॥
मृगेन्द्रचर्मवसनं मुनीनामेकजीवनम् ।
सर्वदेवादिपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II८०॥
निधनेशं धनाधीशं अपमृत्युविनाशनम् ।
लिङ्गमूर्तिमलिङ्गात्मं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥८१॥
भक्तकल्याणदं व्यस्तं वेदवेदान्तसंस्तुतम् ।
कल्पकृत्कल्पनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥८२॥
घोरपातकदावाग्निं जन्मकर्मविवर्जितम् ।
कपालमालाभरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८३॥
मातङ्गचर्मवसनं विराड्रूपविदारकम् ।
विष्णुक्रान्तमनन्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८४॥
यज्ञकर्मफलाध्यक्षं यज्ञविघ्नविनाशकम् ।
यज्ञेशं यज्ञभोक्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II८५॥
कालाधीशं त्रिकालज्ञं दुष्टनिग्रहकारकम् ।
योगिमानसपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८६॥
महोन्नतमहाकायं महोदरमहाभुजम् ।
महावक्त्रं महावृद्धं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८७॥
सुनेत्रं सुललाटं च सर्वभीमपराक्रमम् ।
महेश्वरं शिवतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् II८८॥
समस्तजगदाधारं समस्तगुणसागरम् ।
सत्यं सत्यगुणोपेतं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ ८९॥
माघकृष्णचतुर्दश्यां पूजार्थं च जगद्गुरोः ।
दुर्लभं सर्वदेवानां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९०॥
तत्रापि दुर्लभं मन्येत् नभोमासेन्दुवासरे ।
प्रदोषकाले पूजायां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९१॥
तटाकं धननिक्षेपं ब्रह्मस्थाप्यं शिवालयम्
कोटिकन्यामहादानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९२॥
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II९३॥
तुलसीबिल्वनिर्गुण्डी जम्बीरामलकं तथा ।
पञ्चबिल्वमिति ख्यातं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥९४॥
अखण्डबिल्वपत्रैश्च पूजयेन्नन्दिकेश्वरम् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९५॥
सालङ्कृता शतावृत्ता कन्याकोटिसहस्रकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥९६॥
दन्त्यश्वकोटिदानानि अश्वमेधसहस्रकम् ।
सवत्सधेनुदानानि एकबिल्वं शिवार्पणम् II९७॥
चतुर्वेदसहस्राणि भारतादिपुराणकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥९८॥
सर्वरत्नमयं मेरुं काञ्चनं दिव्यवस्त्रकम् ।
तुलाभागं शतावर्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९९॥
अष्टोत्तरश्शतं बिल्वं योऽर्चयेल्लिङ्गमस्तके ।
अधर्वोक्तं अधेभ्यस्तु एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१००॥
काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरवदर्शनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०१॥
अष्टोत्तरशतश्लोकैः स्तोत्राद्यैः पूजयेद्यथा ।
त्रिसन्ध्यं मोक्षमाप्नोति एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥१०२॥
दन्तिकोटिसहस्राणां भूः हिरण्यसहस्रकम् 
सर्वक्रतुमयं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०३॥
पुत्रपौत्रादिकं भोगं भुक्त्वा चात्र यथेप्सितम् ।
अन्ते च शिवसायुज्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥१०४॥
विप्रकोटिसहस्राणां वित्तदानाच्च यत्फलम् ।
तत्फलं प्राप्नुयात्सत्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०५॥
त्वन्नामकीर्तनं तत्त्वं तवपादाम्बु यः पिबेत् 
जीवन्मुक्तोभवेन्नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०६॥
अनेकदानफलदं अनन्तसुकृतादिकम् ।
तीर्थयात्राखिलं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०७॥
त्वं मां पालय सर्वत्र पदध्यानकृतं तव ।
भवनं शाङ्करं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०८॥

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

स्वधा स्तोत्रम्

#स्वधास्तोत्रम"*
          *मंत्र*:-*।।ॐ ऐं सर्व पितृभ्यो स्वधा।।*                            
 _*ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।*_
  _*नम: स्वाहायै स्वाधायै नित्यमेव नमो नम:।।*_      
                  *"स्वधास्तोत्रम"*
*स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नर:।*
*मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्।।1।।*

*स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्।*
*श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च।।2।।*

*श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं य: श्रृणोति समाहित:।*
*लभेच्छ्राद्धशतानां च पुण्यमेव न संशय:।।3।।*

*स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर:।*
*प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्।।4।।*

*पितृणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी।*
*श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा।।5।।*

*बहिर्गच्छ मन्मनस: पितृणां तुष्टिहेतवे।*
*सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे।।6।।*

*नित्या त्वं नित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते।*
*आविर्भावस्तिरोभाव: सृष्टौ च प्रलये तव।।7।।*

*ॐ स्वस्तिश्च नम: स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा।*
*निरूपिताश्चतुर्वेदे षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्।।8।।*

*पुरासीस्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिकासखी।*
*धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता।।9।।*

*इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि।*
*तस्थौ च सहसा सद्य: स्वधा साविर्बभूव ह।।10।।*

*तदा पितृभ्य: प्रददौ तामेव कमलाननाम्।*
*तां सम्प्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिता:।।11।।*

*स्वधास्तोत्रमिदं पुण्यं य: श्रृणोति समाहित:।*
*स स्नात: सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत्।।12।।*

*।।इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे ब्रह्माकृतं स्वधास्तोत्रं सम्पूर्णम्।।*

सोमवार, 3 नवंबर 2025

डॉ. हरिओम पंवार की कविता

 कल तुम मेरा नाम पढ़ोगे इतिहासों के शिलालेख पर

       जिनके पैरों में छाले हैं मै उनकी आँखों का जल हूँ ।

मै पीड़ाओं का गायक हूँ

शब्दों का व्यापार नहीं हूँ

जहाँ सभी चीजें बिकती हैं

मै ऐसा बाज़ार नहीं हूँ

मुझ पर प्रश्न चिन्ह मत थोपो कुंठित व्याकरणी पैमानो

मुझको रामकथा-सा पढ़िये बहुत सहज हूँ, बहुत सरल हूँ।


दरबारों की मेहरबानियाँ

जड़ भी चतुर-सुजान हो गए

जुगनू विरुदावलियाँ गाकर

साहित्यिक दिनमान हो गए 

मै डरकर अभिनन्दन गाऊँ, इससे से अच्छा है मर जाऊं

मै सागर का क़र्ज़ चुकाने वाला आवारा बादल हूँ ।


मैंने पगडण्डी नापी है

आपने पैरों हौले-हौले 

मेरे दर से खाली लौटे

राजनीति के उड़नखटोले

राजभवन के कालीनों पर मेरे ठोकर चिन्ह मिलेंगे

मै आँसू का ताजमहल हूँ झोपड़ियों का राजमहल हूँ।


मेरा मोल लगाने बैठे 

हैं कुछ लोग तिजोरी खोले

दुनिया में इतना धन कब है 

जो मेरी खुद्दारी तोले।

जब से मुझको नील-कंठनी कलम विधाता ने सौंपी है

तन में चित्रकूट-वृन्दावन, मन में गंगा की कलकल हूँ।

-डॉ. हरिओम पंवार