सोमवार, 5 दिसंबर 2011

जहाँ हर सिर झुकता है , वही मंदिर है |
जहाँ हर नदी समाती है , वही समंदर है |
जीवन की कर्मभूमि में , युद्ध बहुत हैं |
जो हर जंग जीतता है, वही सिकंदर है |

रविवार, 4 दिसंबर 2011

सूर्य की रश्मि बनकर जग रोशन करना है,
पुष्प की सुगंध बनकर खुसबू को चमन में भरना है |
दीपक की बाती बनकर तम को हरना है,
सितारों की चमक बनकर आकाश को निखरना है |
जलद की फुहार बनकर तपती धरा को शीतल करना है,
चाँद की चांदनी बनकर आंचल धरती का भरना है |
वटवृक्ष बनकर घनी धूप में छाँव करना है ||
काँटों से घिर कर भी गुलाब की तरह महकाना सीखो,
पंक में रहकर भी नीरज की तरह खिलना सीखो |
परिस्थितियों से घबराने वाला मानव लोह्पुरुष नहीं होता,
राख में रहकर भी अंगारे की तरह दहकना सीखो ||
जीवन चार दिनों का मेला है,
क्यों पल पल रोना है |
हर दिल में खुशियाँ भर,
कर दो हर सपन सलोना ||

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

वजूद अपना - अपना

ये दुनिया खुदगर्जी का मेला है,
हर इंसान भीड़ में अकेला है|
वजूद अपना ढूंढता है हर कोई,
वजूद का सफर गरूर से है होई||

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

ये दुनिया खुदगर्जी का मेला है,
हर इंसान भीड़ में अकेला है
वजूद अपना

शनिवार, 3 सितंबर 2011

मैं ढूंढता हूं


मैं ढूंढता हूं उनको रातों को ख्यालों में
वो मुझको मिल सके ना सुबहा के उजालों में।।

मीठी-2 प्यार की बातें, मेरे खादीदार की बातें।
कभी इकरार की बातें, कभी इन्कार की बातें।।
एक डर सा छुपा है उनकी हंसी चालों में।
मैं ढूंढता हूं ..........

जो यूं बेईमान होते हैं, वो कब ईमानदार होते हे ।
दिल ए नाशाद होते हैं, वो इक फरेबगार होते है।।
उलझा हुआ था कबसे, घूसखोरों के अजीब जालों में।
मैं ढूंढता हूं उनको .........