गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सुमन तेरी राहों में हों, शोले  तुम से दूर हों |
खुशियों की सौगात  मिले तुमको, मुसीबते काफूर हों |
उदासी रहे दूर सदा, मुखड़ा हो जैसे चंदा |
हर प्रार्थना तेरी मंजूर हो, चेहरे पे लाली मुख में खजूर हों |
खुशियाँ ले लो , खुशियाँ दे दो |
खुशियों की लडियाँ भरपूर हों |

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

जहाँ हर सिर झुकता है , वही मंदिर है |
जहाँ हर नदी समाती है , वही समंदर है |
जीवन की कर्मभूमि में , युद्ध बहुत हैं |
जो हर जंग जीतता है, वही सिकंदर है |

रविवार, 4 दिसंबर 2011

सूर्य की रश्मि बनकर जग रोशन करना है,
पुष्प की सुगंध बनकर खुसबू को चमन में भरना है |
दीपक की बाती बनकर तम को हरना है,
सितारों की चमक बनकर आकाश को निखरना है |
जलद की फुहार बनकर तपती धरा को शीतल करना है,
चाँद की चांदनी बनकर आंचल धरती का भरना है |
वटवृक्ष बनकर घनी धूप में छाँव करना है ||
काँटों से घिर कर भी गुलाब की तरह महकाना सीखो,
पंक में रहकर भी नीरज की तरह खिलना सीखो |
परिस्थितियों से घबराने वाला मानव लोह्पुरुष नहीं होता,
राख में रहकर भी अंगारे की तरह दहकना सीखो ||
जीवन चार दिनों का मेला है,
क्यों पल पल रोना है |
हर दिल में खुशियाँ भर,
कर दो हर सपन सलोना ||

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

वजूद अपना - अपना

ये दुनिया खुदगर्जी का मेला है,
हर इंसान भीड़ में अकेला है|
वजूद अपना ढूंढता है हर कोई,
वजूद का सफर गरूर से है होई||

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

ये दुनिया खुदगर्जी का मेला है,
हर इंसान भीड़ में अकेला है
वजूद अपना