मंगलवार, 29 मार्च 2022

व्रत के प्रकार व जानकारी

 व्रत या उपवास विषयक आवश्यक जानकारी -


व्रत या उपवास कितने प्रकार के होते हैं.???


व्रत रखने के नियम दुनिया को सनातन धर्म की देन है। व्रत रखना एक पवित्र कर्म है और यदि इसे नियम पूर्वक नहीं किया जाता है तो न तो इसका कोई महत्व है और न ही लाभ बल्कि इससे नुकसान भी हो सकते हैं। आप व्रत बिल्कुल भी नहीं रखते हैं तो भी आपको इस कर्म का भुगतान करना ही होगा। राजा भोज के राजमार्तण्ड में 24 व्रतों का उल्लेख है।


हेमादि में 700 व्रतों के नाम बताए गए हैं। गोपीनाथ कविराज ने 1622 व्रतों का उल्लेख अपने व्रतकोश में किया है। व्रतों के प्रकार तो मूलत: तीन है:- 1. नित्य, 2. नैमित्तिक और 3. काम्य।

 

1.नित्य व्रत - उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना, प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन नहीं करते से मानव दोषी माना जाता है।

 

2.नैमिक्तिक व्रत - उसे कहते हैं जिसमें किसी प्रकार के पाप हो जाने या दुखों से छुटकारा पाने का विधान होता है। अन्य किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण प्रभृति, तिथि विशेष में जो ऐसे व्रत किए जाते हैं वे नैमिक्तिक व्रत हैं।

 

3.काम्य व्रत -  किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं, जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए, धन- समृद्धि के लिए या अन्य सुखों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले व्रत काम्य व्रत हैं।


व्रतों का वार्षिक चक्र 

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1.साप्ताहिक व्रत -  सप्ताह में एक दिन व्रत रखना चाहिए। यह सबसे उत्तम है।

 

2.पाक्षिक व्रत - 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक पक्ष में चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या और पूर्णिमा के व्रत महतवपूर्ण होते हैं। उक्त में से किसी भी एक व्रत को करना चाहिए।

 

3.त्रैमासिक -  वैसे त्रैमासिक व्रतों में प्रमुख है नवरात्रि के व्रत। हिंदू माह अनुसार पौष, चैत्र, आषाढ और अश्विन मान में नवरात्रि आती है। उक्त प्रत्येक माह की प्रतिपदा यानी एकम् से नवमी तक का समय नवरात्रि का होता है। इन नौ दिनों तक व्रत और उपवास रखने से सभी तरह के क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

 

4.छह मासिक व्रत -  चैत्र माह की नवरात्रि को बड़ी नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि को छोटी नवरात्रि कहते हैं। उक्त दोंनों के बीच छह माह का अंतर होता है। इसके अलावा

 

5.वार्षिक व्रत -  वार्षिक व्रतों में पूरे श्रावण मास में व्रत रखने का विधान है। इसके अलवा जो लोग चतुर्मास करते हैं उन्हें जिंदगी में किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता है। इससे यह सिद्ध हुआ की व्रतों में 'श्रावण माह' महत्वपूर्ण होता है। सोमवार नहीं पूरे श्रावण माह में व्रत रखने से हर तरह के शारीरिक और मानसिक कलेश मिट जाते हैं।


उपवास के प्रकार -  1.प्रात: उपवास, 2.अद्धोपवास, 3.एकाहारोपवास, 4.रसोपवास, 5.फलोपवास, 6.दुग्धोपवास, 7.तक्रोपवास, 8.पूर्णोपवास, 9.साप्ताहिक उपवास, 10.लघु उपवास, 11.कठोर उपवास, 12.टूटे उपवास, 13.दीर्घ उपवास। बताए गए हैं, लेकिन हम यहां वर्ष में जो व्रत होते हैं उसके बारे में बता रहे हैं।

 

1.प्रात: उपवास - इस उपवास में सिर्फ सुबह का नाश्ता नहीं करना होता है और पूरे दिन और रात में सिर्फ 2 बार ही भोजन करना होता है।

 

2.अद्धोपवास - इस उपवास को शाम का उपवास भी कहा जाता है और इस उपवास में सिर्फ पूरे दिन में एक ही बार भोजन करना होता है। इस उपवास के दौरान रात का भोजन नहीं खाया जाता।

 

3.एकाहारोपवास -  एकाहारोपवास में एक समय के भोजन में सिर्फ एक ही चीज खाई जाती है, जैसे सुबह के समय अगर रोटी खाई जाए तो शाम को सिर्फ सब्जी खाई जाती है। दूसरे दिन सुबह को एक तरह का कोई फल और शाम को सिर्फ दूध आदि।

 

4.रसोपवास -  इस उपवास में अन्न तथा फल जैसे ज्यादा भारी पदार्थ नहीं खाए जाते, सिर्फ रसदार फलों के रस अथवा साग-सब्जियों के जूस पर ही रहा जाता है। दूध पीना भी मना होता है, क्योंकि दूध की गणना भी ठोस पदार्थों में की जा सकती है।

 

5.फलोपवास - कुछ दिनों तक सिर्फ रसदार फलों या भाजी आदि पर रहना फलोपवास कहलाता है। अगर फल बिलकुल ही अनुकूल न पड़ते हो तो सिर्फ पकी हुई साग-सब्जियां खानी चाहिए।

 

6.दुग्धोपवास -  दुग्धोपवास को 'दुग्ध कल्प' के नाम से भी जाना जाता है। इस उपवास में सिर्फ कुछ दिनों तक दिन में 4-5 बार सिर्फ दूध ही पीना होता है।

 

7.तक्रोपवास -  तक्रोपवास को 'मठाकल्प' भी कहा जाता है। इस उपवास में जो मठा लिया जाए, उसमें घी कम होना चाहिए और वो खट्टा भी कम ही होना चाहिए। इस उपवास को कम से कम 2 महीने तक आराम से किया जा सकता है।

 

8.पूर्णोपवास - बिलकुल साफ-सुथरे ताजे पानी के अलावा किसी और चीज को बिलकुल न खाना पूर्णोपवास कहलाता है। इस उपवास में उपवास से संबंधित बहुत सारे नियमों का पालन करना होता है।

 

9. साप्ताहिक उपवास - पूरे सप्ताह में सिर्फ एक पूर्णोपवास नियम से करना साप्ताहिक उपवास कहलाता है।

 

10. लघु उपवास - 3 से लेकर 7 दिनों तक के पूर्णोपवास को लघु उपवास कहते हैं।

 

11. कठोर उपवास -  जिन लोगों को बहुत भयानक रोग होते हैं यह उपवास उनके लिए बहुत लाभकारी होता है। इस उपवास में पूर्णोपवास के सारे नियमों को सख्ती से निभाना पड़ता है।

 

12. टूटे उपवास -  इस उपवास में 2 से 7 दिनों तक पूर्णोपवास करने के बाद कुछ दिनों तक हल्के प्राकृतिक भोजन पर रहकर दोबारा उतने ही दिनों का उपवास करना होता है। उपवास रखने का और हल्का भोजन करने का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि इस उपवास को करने का मकसद पूरा न हो जाए।

 

13. दीर्घ उपवास -  दीर्घ उपवास में पूर्णोपवास बहुत दिनों तक करना होता है जिसके लिए कोई निश्चित समय पहले से ही निर्धारित नहीं होता। इसमें 21 से लेकर 50-60 दिन भी लग सकते हैं। अक्सर यह उपवास तभी तोड़ा जाता है, जब स्वाभाविक भूख लगने लगती है अथवा शरीर के सारे जहरीले पदार्थ पचने के बाद जब शरीर के जरूरी अवयवों के पचने की नौबत आ जाने की संभावना हो जाती है।

।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।

               🙏  धन्यवाद  🙏,

कृष्ण बलराम का बैकुंठपुर में प्रस्थान

 *महाभारत:* 

*अंत समय में बलराम के मुख से निकले थे शेषनाग!!!!!!*

जब गांधारी के श्राप को सत्य करने का समय आया तो श्रीकृष्ण ने अंधक व वृष्णि वंशियों को प्रभास क्षेत्र में आकर रहने के लिए कहा।

 युद्ध के उपरांत 15 सालों तक हस्तिनापुर में रहने के बाद धृतराष्ट्र व गांधारी तप करने वन चले गए। उनके साथ कुंती व विदुर भी थे। 1 साल बाद युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ उनसे मिलने पहुंचे।

 इस दौरान महर्षि वेदव्यास ने अपने तपोबल से युद्ध में मारे गए सभी योद्धाओं को एक रात के लिए जीवित कर दिया। कुछ दिनों बाद युधिष्ठिर पुन: हस्तिनापुर लौट आए। इस घटना के 2 साल बाद जंगल में आग लगने के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती की मृत्यु हो गई।

जब गांधारी के श्राप को सत्य करने का समय आया तो श्रीकृष्ण ने अंधक व वृष्णिवंशियों को प्रभास क्षेत्र में आकर रहने के लिए कहा। एक दिन किसी बात पर क्रोधित होकर सात्यकि ने कृतवर्मा का वध कर दिया। देखते ही देखते सभी लोग एक-दूसरे के प्राण लेने लगे। श्रीकृष्ण ने भी क्रोधित होकर सभी का वध कर दिया। इसके बाद बलराम व श्रीकृष्ण ने भी अपने देह का त्याग कर दिया। 

जब अर्जुन को यह बात पता चली तो वह द्वारिका आए और यदुवंश की स्त्रियों व द्ववारिका वासियों को अपने साथ लेकर हस्तिनापुर ले जाने लगे। अर्जुन व द्वारिकावासी जैसे नगर से निकले, उसी समय द्वारिका नगरी समुद्र में डूब गई। 

*ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप -*

महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?      

ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी।

*द्वारका में होने लगे थे भयंकर अपशकुन -*

मुनियों के श्राप के प्रभाव से दूसरे दिन ही सांब ने मूसल उत्पन्न किया। जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने उस मूसल को चुरा कर समुद्र में डलवा दिया। इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर द्वारकावासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया।   

इसके बाद द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे। प्रतिदिन आंधी चलने लगी। चूहे इतने बढ़ गए कि मार्गों पर मनुष्यों से ज्यादा दिखाई देने लगे। वे रात में सोए हुए मनुष्यों के बाल और नाखून कुतरकर खा जाया करते थे। सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की आवाज निकालने लगे। गायों के पेट से गधे, कुत्तियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी।

-   जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे। उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे। 

प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया।

 सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए। 

*यदुवंशियों के नाश के बाद अर्जुन को बुलवाया था श्रीकृष्ण ने 

अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)। 

उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मरने लगे।    श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृत्यु हो गई। 

फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे। श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए।

*बलरामजी के स्वधाम गमन के बाद ये किया श्रीकृष्ण ने ????* - द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े। 

वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों मस्तक थे।

 समुद्र ने स्वयं प्रकट होकर भगवान शेषनाग का स्वागत किया। बलरामजी द्वारा देह त्यागने के बाद श्रीकृष्ण उस सूने वन में विचार करते हुए घूमने लगे।

 घूमते-घूमते वे एक स्थान पर बैठ गए और गांधारी द्वारा दिए गए श्राप के बारे में विचार करने लगे। देह त्यागने की इच्छा से श्रीकृष्ण ने अपनी इंद्रियों का संयमित किया और महायोग (समाधि) की अवस्था में पृथ्वी पर लेट गए।

*ऐसे त्यागी श्रीकृष्ण ने देह!!!!!!*

  - जिस समय भगवान श्रीकृष्ण समाधि में लीन थे, उसी समय जरा नाम का एक शिकारी हिरणों का शिकार करने के उद्देश्य से वहां आ गया। उसने हिरण समझ कर दूर से ही श्रीकृष्ण पर बाण चला दिया। बाण चलाने के बाद जब वह अपना शिकार पकडऩे के लिए आगे बढ़ा तो योग में स्थित भगवान श्रीकृष्ण को देख कर उसे अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। तब श्रीकृष्ण ने उसे आश्वासन दिया और अपने परमधाम चले गए। अंतरिक्ष में पहुंचने पर इंद्र, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु, मुनि आदि सभी ने भगवान का स्वागत किया।

इधर दारुक ने हस्तिनापुर जाकर यदुवंशियों के संहार की पूरी घटना पांडवों को बता दी। यह सुनकर पांडवों को बहुत शोक हुआ। अर्जुन तुरंत ही अपने मामा वसुदेव से मिलने के लिए द्वारका चल दिए। अर्जुन जब द्वारका पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर उन्हें बहुत शोक हुआ। श्रीकृष्ण की रानियां उन्हें देखकर रोने लगी। उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ।

  - वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा। अर्जुन ने मंत्रियों से कहा कि आज से सातवे दिन सभी लोग इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करेंगे इसलिए आप शीघ्र ही इसके लिए तैयारियां शुरू कर दें। सभी मंत्री तुरंत अर्जुन की आज्ञा के पालन में जुट गए। अर्जुन ने वह रात श्रीकृष्ण के महल में ही बिताई। 

अगली सुबह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेवजी ने प्राण त्याग दिए। अर्जुन ने विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया। वसुदेवजी की पत्नी देवकी, भद्रा, रोहिणी व मदिरा भी चिता पर बैठकर सती हो गईं। इसके बाद अर्जुन ने प्रभास तीर्थ में मारे गए समस्त यदुवंशियों का भी अंतिम संस्कार किया। सातवे दिन अर्जुन श्रीकृष्ण के परिजनों तथा सभी नगरवासियों को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल दिए। उन सभी के जाते ही द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। ये दृश्य देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

कली जो सो ग ई

जो कली सो गई रात को
फूल बन गई वह सुबह,
मेरी लाडली, तू भी सो जा।

पत्तियों पै झुकी चांदनी
डालियों पै रुकी चांदनी,
नींद में चल रही है हवा।
मेरी लाडली, तू भी सो जा।

बादलों में हवा सो गई
रोशनी भी कहीं खो गई,
नींद से बुझता जाए दिया।
मेरी लाडली, तू भी सो जा।

रात बीतेगी, होगी सहर
फूल खिलके तू महकेगी फिर,
रंग लाएगा हर दिन नया।
मेरी लाडली, तू भी सो जा।

रविवार, 18 अप्रैल 2021

दोस्ती का मजा

सच कहूं ए दोस्त...
आज भी उतना ही मजा आता है
तुम्हे याद करके. ...

जब हम साथ में हंसते थे, 
मुश्किल में हाथ थामते थे, 
गलती पे डांटते थे, 
एक दूसरे का बेसब्री से 
इंतजार करते थे....

जब हम साथ में होमवर्क करते थे,
गणित के सवाल सुलझाते थे
उलझनों से पार जो पाते थे,
बस्ता लटकाए एक-दूसरे का
इन्तजार करते थे....

एक दूसरे को खोने से 
डरते थे....

पर आज वो डर सच हो गया.....
बिता हुआ जमाना 
आँसू बनके बह गया....!!

मेरा अक्स

मेरा अक्स आँखों में कोई देख लेगा
पलकों में छुपा लो कोई देख लेगा

झील सी गहराई है मुझे डूब जाने दो
किनारे पर रहूँगा तो कोई देख लेगा

इसी राह से मैं आऊँगा तेरे अंजुमन में
दूसरी राह से आया तो कोई देख लेगा

बन के काजल आँखों में बस जाने दो
चिलमन न गिराया तो कोई देख लेगा

बिखरें तो शायर बस मुस्कान के मोती
मुझे तेरे अश्कों ने रुलाया तो कोई देख लेगा

दिल का दर्द

कोई एक कागज कलम दे दो, 
दिल का दर्द उतारना है, 
उसकी एक तस्वीर भी ला दो, 
उसके वादे गिनवाना है ,
उसकी मुस्कराहट भी याद दिला दो, 
आज हमें भी मुस्कुराना है ,
कोई वो दौर फिर से वापस ला दो, 
एक बार फिर उसे आजमाना है, 
इस बार वो नहीं , 
हमें उनको तनहा छोड़के जाना है....!!

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

राहु ग्रह के दुष्प्रभाव

 राहु ग्रह के दुष्प्रभाव (भाग 1)

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तार्किक शक्ति एवं आलोचना का ग्रह राहु

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भारतीय ज्योतिष में राहु एक संसारिक ग्रह है। जबकि गुरू को परलौकिक ग्रह माना गया है। गुरू ग्रह का ऐसा मानना है कि जो कुछ हो रहा है वह सब कुछ सर्वशक्तिमान अर्थात् ग्रह (भगवान) की देन है जैसे सुख-दुख जीवन का अभिन्न अंग है । सुख का पता उसी को चलता है जिसने दुख देखा हो। जिसने दुख नहीं देखा है वह सुख भी नहीं महसूस करेगा। जैसे अगर किसी इन्सान को पूड़ी सब्जी और आचार रोज खाने को दिया जाये तो एक दिन उसका मन इससे भी भर जायेगा । फिर वह पूड़ी न खाकर कुछ और खाना चाहेगी। श्री कृष्ण भगवान भी गीता में कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को कोई चीज आसानी से मिल जाती है तो उसकी कीमत नहीं समझता है। जितना उसे मुश्किल से प्राप्त होगा, बहुत मेहनत करने से प्राप्त होगा उतना उसकी कीमत को समझेगा।


कोई व्यक्ति बस से जा रहा था। चालक ने ध्यान से चलाया लेकिन बस फिर भी पेड़ से टकरा गई और व्यक्ति का हाथ पैर टूट गया या व्यक्ति मर गये। कुछ लोग इस पर तर्क करेंगे कि ड्राइवर ठीक से नहीं चला रहा था जबकि जिसके कुण्डली में गुरू प्रधान है वह तर्क नहीं करेंगे वह बोलेंगे कि दुख लिखा था इस कारण बहाना बनकर आया। राहु एक तार्किक ग्रह है इसी कारण जातक तर्क वितर्क करके सभी पहलू पर ध्यान देकर एक-दूसरे पर दोष लगाकर भी काम करेगा।


राहु को आलोचना करना बहुत पसन्द है। दूसरों की कमी निकालकर बुराई करके अपना अच्छा बनने की कोशिश करेंगे। बात थोड़ी-सी होगी तब भी दूसरे के ऊपर सारा दोष लगा देंगे। आज राजनीति में राहु आया हुआ है। इसी कारण राजनीतिक पार्टियां अपना अच्छा काम न करके बल्कि एक-दूसरे पर दोष-रोपण करके अपना लाभ उठाना चाहती हैं। यही बात परिवार में भी देखा गया कि सास और बहु एक दूसरे पर दोषारोपण करती है और पति/पत्नी में भी तू-तू मैं-मैं होती रहती है जवकि दोनों को ऐसा चाहिए। सास बहु को अपनी बेटी समझे और बहु सास को अपनी माता समझे । इससे गुरू और चन्द्र का प्रभाव बढ़ जायेगा और सुख शान्ति बढ़नी शुरू हो जायेगी। पति-पत्नी में तू-तू मैं-मैं नहीं होनी चाहिए बल्कि एक ने गलती की दूसरे ने की बल्कि दोनों को मिलकर यह कहना चाहिए कि अगर कोई गलती हुई है तो हमने की है इससे दोनों के अभिमान और अंह में कमी आकर जीवन अच्छा चलेगा। हर इन्सान का चेहरा परमात्मा ने अलग-अलग किस्म का बनाया है जो आपके लिए अच्छा है वह दूसरे के लिए खराब हो सकता है। इसी कारण सबके विचार सबसे नहीं मिलते हैं अगर किसी की आलोचना-बुराई कर रहे हैं वह आपके निगाह में खराब हो सकता है लेकिन दूसरे के नजर में हो सकता है वह बुरा न हो बल्कि सामान्य घटनायें हो।


राहु के बारह भावो में शुभाशुभ फल

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राहु लग्न में👉 स्थित हो तो जातक दुष्ट स्वभाव का, शिरो-रोगी, विवादी, मिथ्याचारी, वात रोगी, अस्थिर मति तथा त्वचा रोग से पीड़ित होगा। राहु का योग होने पर वह उन्मादी होगा।


राहु द्वितीय भाव👉 में हो तो जातक अप्रिय बोलने वाला, धन नाशक, व्यर्थ भ्रमण करने वाला, मुख रोग से पीड़ित तथा वित्तीय अस्थिरता से युक्त होगा। परिवार में मतभेद रहेंगे।


राहु तृतीय भाव👉  में हो तो जातक यशस्वी, शत्रुओं का दमन करने वाला, अरिष्टों से रहित, धनी, दीर्घायु एवं साहसी होगा परंतु भातृ कष्ट से पीड़ित रहेगा।


राहु चतुर्थ भाव👉 में हो तो जातक भ्रमणकारी, कपटी, माता व मित्र सुख से रहित, कुसंगी तथा हृदय में चिन्ता से युक्त होगा।


राहु पंचम भाव👉 में हो तो जातक उदर रोगी, पुत्रों से कष्ट उठाने वाला, विद्या में बाधा से युक्त तथा दूसरों के द्वारा गलत समझा जाने वाला होगा। यदि राहु शुभ राशि में शुभयुक्त एवं शुभ दृष्ट हो तो वह तीक्ष्ण बुद्धि से युक्त, उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाला और औषधि ज्ञान रखने वाला होगा। सर्प दोष के कारण पुत्र प्राप्ति में बाधा होगी।


राहु षष्ठम भाव👉 में हो तो जातक शत्रुरहित होगा। उसकी आंतों में कीड़े होंगे तथा कमर में दर्द रहेगा। वह धनी एवं दीर्घायु होगा। राहु पापयुत या पापदृष्ट हो तो होंठों पर व्रण होगा।


राहु सप्तम भाव👉  में हो तो जातक के विवाह में विलम्ब होगा पत्नी गर्भाशय रोग से पीड़ित होगी यदि राहु पापी ग्रह से योग करे तो पत्नी चिड़चिड़े स्वभाव की होगी। वह मूत्र संबंधी रोग से पीड़ित रहेगा।


राहु अष्टम भाव👉 में हो तो जातक बवासीर एवं वात विकार से पीड़ित, अल्पायु, अशुद्ध कर्म करने वाला, चरित्रहीन, कपटी, मानसिक रोगी तथा झगड़ालु प्रकृति का होगा।


राहु नवम भाव👉 में हो तो जातक प्रतिकूल वचन बोलने वाला अनैतिक, ईश्वर एवं धर्म का निन्दक, मिथ्या वचन करने वाला भाग्यहीन तथा दुराचारी होगा। यदि राहु शुभ राशि में शुभ ग्रहों से संबंध करे तो ऐसा व्यक्ति भाग्यवान तथा मां दुर्गा का भक्त होगा।


राहु दशम भाव👉 में हो तो जातक पितृ सुख से रहित, दूसरों के कार्य में रत, सत्कर्महीन तथा विख्यात होगा। शुभ ग्रहों से योग करने पर राहु शुभ फल तथा यश देने वाला होगा।


राहु एकादश भाव👉 में सदैव शुभ फल देगा एवं अरिष्ट नाशक होगा। ऐसे जातक को राज-सम्मान, समस्त भोग्य पदार्थ तथा धन-सम्पत्ति प्राप्त होगी। आयु दीर्घ होगी और कान में रोग रहेगा।


राहु द्वादश भाव👉 में हो तो जातक छिपकर पाप करने वाला, अशान्त, अनैतिक, दुष्टों से स्नेह करने वाला, नेत्र रोगी, व्यर्थ का व्यय करने वाला तथा पांवों में पीड़ा से युक्त होता है।


राहु को शुभ बनाने के अन्य उपाय

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👉 अपनी शक्ति के अनुसार संध्या को काले-नीले फूल, गोमेद, नारियल, मूली, सरसों, नीलम, कोयले, खोटे सिक्के, नीला वस्त्र किसी कोढ़ी को दान में देना चाहिए। 


👉 राहु की शांति के लिए लोहे के हथियार, नीला वस्त्र, कम्बल, लोहे की चादर, तिल, सरसों तेल, विद्युत उपकरण, नारियल एवं मूली दान करना चाहिए. सफाई कर्मियों को लाल अनाज देने से भी राहु की शांति होती है।


👉 राहु से पीड़ित व्यक्ति को शनिवार का व्रत करना चाहिए इससे राहु ग्रह का दुष्प्रभाव कम होता है।


👉 मीठी रोटी कौए को दें अथवा गरीबों (मजदूर) को चावल और मांसहार करायें।


👉 राहु की दशा होने पर कुष्ट से पीड़ित व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए।


👉 गरीब व्यक्ति की कन्या की शादी करनी चाहिए।


👉 राहु की दशा से आप पीड़ित हैं तो अपने सिरहाने जौ रखकर सोयें और सुबह उनका दान कर दें इससे राहु की दशा शांत होगी।


👉 ऐसे व्यक्ति को चांदी का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।


👉 हाथी दाँत का लाकेट गले में धारण करना चाहिए।

   

👉 अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए। सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है।


👉 जमादार को तम्बाकू का दान करना चाहिए।


👉 चांदी की चेन गले में पहने ।


👉 दिन के संधिकाल में अर्थात् सूर्योदय या सूर्यास्त के समय कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नही करना चाहिए।


👉 यदि किसी अन्य व्यक्ति के पास रुपया अटक गया हो, तो प्रातःकाल पक्षियों को दाना चुगाना चाहिए।


👉 झुठी कसम नही खानी चाहिए।


राहु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, राहु के नक्षत्र (आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।


क्या न करें 

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मदिरा और तम्बाकू के सेवन से राहु की दशा में विपरीत परिणाम मिलता है अत: इनसे दूरी बनाये रखना चाहिए. आप राहु की दशा से परेशान हैं तो संयुक्त परिवार से अलग होकर अपना जीवन यापन करें।


पं देवशर्मा

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