शनिवार, 16 जुलाई 2022

सावन की बरसात

आज सावन की पहली बरसात 
हलधरा ने मिल गी इंद्र गी सौगात
ऊं तो षाढ भी नीं गयो खाली
पेली बिरखा सूं धरती होगी आली
मोठ-बाजरी मूंगफली बीज दिया हाली 
खेतां गो होग्यो बिजान नी रहया खाली
इकान्तर बरस आसमान सूं खूब पाणी 
गांव गली में कीचड़ गी मच गी घाणी
आभो बरस्यां उगसी खूब लीलो
चौपायां न सांवरियो क जीलो
आ बात केणी है सोखी
के बाबू साची व चोखी

शनिवार, 11 जून 2022

कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है

 कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है

  सोना


सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।


 चाँदी


चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है  इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।


 कांसा


काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में  शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।


 तांबा


तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।


पीतल


पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।


 लोहा


लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से  शरीर  की  शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और  पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।


 स्टील


स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी  नहीं पहुँचता।


 एलुमिनियम


एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।


  मिट्टी


मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैमिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।


पानी पीने के पात्र के विषय में 'भावप्रकाश ग्रंथ' में लिखा है....


*जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।*

*पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।*

*काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।*

(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)


अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।

गरूड़ पुराण की अचूक जानकारी

 गरुण पुराण के बारे में कई भ्रांतियां हैं। जैसे कहा जाता है कि गरुण पुराण, सिर्फ मृत्यु के समय पढ़ा जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। गरुण पुराण में कई ऐसे अचूक उपाय हैं, जिसके बारे में कम लोग जानते हैं। संजीवनी विद्या उन्हीं में से एक है। इस विद्या में, मृत व्यक्ति को, जीवित करने का तरीका बताया गया है।


गरुण पुराण में संजीवनी विद्या


गरुण पुराण में संजीवनी विद्या का वर्णन है। इसमें ऐसे ऐसे मंत्र बताये गये हैं, जिससे मृत व्यक्ति भी जीवित हो सकता है। अगर इस मंत्र को सिद्ध करके, मृत व्यक्ति के कान में फूंका जाये, तो वह तुरंत उठ खड़ा होगा। लेकिन मंत्र सिद्धि के बाद, दशांश हवन, और ब्राह्मण भोजन कराना ज़रूरी है।


संजीवनी मंत्र - यक्षि ओम उं स्वाहा


गरुण पुराण में लक्ष्मी मंत्र


गरुण पुराण में सिर्फ श्राद्ध और तर्पण के बारे में ही नहीं लिखा है। बल्कि इसमें लक्ष्मी प्राप्ति के भी अचूक उपाय बताये गये हैं। अगर किसी के जीवन में दरिद्रा लक्ष्मी, डेरा डाले, काफी लंबे समय से बैठी हों, तो इसमें गरीबी दूर करने का अचूक मंत्र बताया गया है। दावा है कि इस मंत्र के जाप से, एक महीने में ही जन्म जन्म की गरीबी दूर हो जाती है।


गरुण पुराण में ग़रीबी दूर करने का मंत्र


ओम जूं स :


इसके अलावा 6 महीने तक लगातार, श्रीविष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भी, मनचाही इच्छा पूरी हो सकती है। अब चाहे यह इच्छा करियर में तरक्की की हो,या फिर ढेर सारी संपत्ति का मालिक बनने की, श्रीविष्णु सहस्त्र नाम के पाठ से, सबकुछ संभव है।


क्या मृत्यु के बाद तुरंत मिलता है शरीर?


गरुड पुराण में, भगवान विष्णु कहते हैं कि मृत्यु के बाद, आत्मा को तुरंत शरीर मिल जाता है। लेकिन कर्मों की गति के आधार पर, कभी कभी देर से भी शरीर मिलता है। मृत्यु के बाद, आत्मा वायु शरीर धारण करती है। उसके बाद पिंडदान से आत्मा, शरीर में बंध जाती है। इसीलिये मृत्यु के बाद, पिंडदान करने से, आत्मा को भटकन से मुक्ति मिल जाती है।


गरुड पुराण में मोक्ष का उपाय


गरुण पुराण में बताया गया है कि मनुष्य को, अंतिम समय में क्या करना चाहिये? इसमें भगवान ने कहा है कि मृत्यु के समय, देह-माया से, आसक्ति कम करनी चाहिये। किसी पवित्र तीर्थ में स्नान करना चाहिये। अगर शरीर साथ दे तो किसी तीर्थ में आसन लगाकर, गायत्री मंत्र जपना चाहिये। अंतिम समय में, ओम के जाप से मोक्ष और मुक्ति मिलती है।


कैसे करें तर्पण?


गरुण पुराण में श्राद्ध और तर्पण के भी नियम बताये गये हैं। तर्पण के लिये, जल में दूध और तिल मिलायें। फिर पितृ गायत्री मंत्र पढ़ते हुये, दक्षिण की ओर मुख कर, बांया घुटना ज़मीन पर लगाकर, जनेऊ,गमक्षा दांयें कंधे पर रख कर तर्पण करना चाहिये। जल के तर्पण के लिये चांदी, तांबे या फिर पीतल के बर्तन प्रयोग करें। लेकिन चांदी के बर्तन से तर्पण करने से, पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है। स्टील के बर्तन से तर्पण न करें।


कैसे पहुंचता है श्राद्ध का भोजन?


विश्वदेव ,अग्निश्रवा दोनों दिव्य पितृ हैं। यह दोनों ही नाम गोत्र के सहारे, हव्य कव्य को पितरों तक पहुंचाते हैं। पितृ, देव योनि में हों तो श्राद्ध का भोजन अमृत रूप में, मनुष्य योनि में हो तो अन्न रूप में, पशु योनि में घास के रूप में, नाग योनि में वायु रूप में, यक्ष योनि में हों तो पान रूप में मिलता है।


जय श्रीराम

गुरुवार, 9 जून 2022

कालखंडों की वास्तविक गणना

 युग (युग और कालखंडों की वास्तविक गणना)

चार युग चक्र के भीतर एक युग या युग का नाम

युग, हिंदु सभ्यता के अनुसार, एक निर्धारित संख्या के वर्षों की कालावधि है। ब्रह्माण्ड का काल चक्र चार युगों के बाद दोहराता है। हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान से हमे यह पता चलता है की हर ४.१-८.२ अरब सालों बाद ब्रम्हांड में जीवन एक बार निर्माण एवं नष्ट होता है। इस कालावधि को हम ब्रह्मा का एक पूरा दिन (रात और दिन मिलाकर) भी मानते है। ब्रह्मा का जीवनकाल ४० अरब से ३११० अरब वर्षों के बीच होता है।

काल के अंगविशेष के रूप में 'युग' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद से ही मिलता है (दश युगे, ऋग्0 1.158.6) इस युग शब्द का परिमाण अस्पष्ट है। ज्यौतिष-पुराणादि में युग के परिमाण एवं युगधर्म आदि की सुविशद चर्चा मिलती है।

वेदांग ज्योतिष में युग का विवरण है (1,5 श्लोक)। यह युग पंचसंवत्सरात्मक है। कौटिल्य ने भी इस पंचवत्सरात्मक युग का उल्लेख किया है। महाभारत में भी यह युग स्मृत हुआ है। पर यह युग पारिभाषिक है, अर्थात् शास्त्रकारों ने शास्त्रीय व्यवहारसिद्धि के लिये इस युग की कल्पना की है। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग एक परिकल्पना है सतयुग की परिकल्पना में सभी इच्छा की पूर्ति तत्काल होती है त्रेतायुग में कुछ इच्छाओं को छोड़कर अत्याधिक इच्छा की पूर्ति होती है और द्वापर में आधे इच्छा की पूर्ति होती है कलयुग में कोई बहुत बहुत कम इच्छा की पूर्ति होती है परन्तु कालयुग की पूर्ण कल्पना होने पर सतयुग पुनः प्रारंभ होता है ।

जो वास्तविक विश्व है मात्र इसमें जीवनयापन करने के लिए मानसिक व शारीरिक परिश्रम करना पड़ता है । परन्तु परिकल्पना की दुनिया में स्वयं की आत्मा व चेतना को प्राप्त करने के लिए अधर्म की शक्तियों से युद्ध करना पड़ता है साथ ही इस विश्व में दुष्ट मनुष्यों के असत्य वचनों व छलकपट को भी समझना पड़ता है ।

परिकल्पना की दुनिया के मिथ्क इस वास्तविक विश्व के दुख दर्द से भी अत्याधिक दुखभरा है अत्याधिक उलझन है अत्याधिक व्याकुलता बैचैनी जब मनुष्य की मन परिकल्पना की दुनिया में प्रवेश करती है तब से अंतिम क्षण अर्थात पांच वर्षों तक सुख और चैन पूरी तरह से जीवन से चला जाता है मात्र सदैव चिंतन मनन परिकल्पना ही रहता है ना जगने पर परिकल्पना खत्म होती है ना निंद्रा में मात्र दिन रात परिकल्पना आती ही रहती है । कहा जाऐ तो भूख गरीबी बीमारी धोखा अपमान मृत्यु से भी भयावह कुछ है तो परिकल्पना की दुनिया की कल्पना अगर वास्तविक दुनिया में सतयुग त्रेता युग व द्वारापाक युग व कालयुग होता तो विश्व का हर मनुष्य व्याकुलता बैचैनी के कारण आत्महत्या कर लेता । युगों के विषय में सभी विद्वानों कों बहुत बड़ी गलत फहमी है, सतयुग 4800x360=1728000यानि 4800वर्ष और दिवस के हिसाब से 1728000दिवस का होता है विद्वानों कि मूर्खता यह हैं कि वे 1728000 वर्ष समझते है इसी तरह त्रेता युग 3600x360 जबकि द्वापर 2400x360 और कलियुग 1200x360 अवधि का होता है युग का यह समयकाल त्रिदेव युग कै अंदर है जबकि महायुग में यह अवधि 9 हजार साल होती है।

🔱युग आदि का परिमाण

मुख्य लौकिक युग सत्य (उकृत), त्रेता, द्वापर और कलि नाम से चार भागों में (चतुर्धा) विभक्त है। इस युग के आधार पर ही मन्वंतर और कल्प की गणना की जाती है। इस गणना के अनुसार सत्य आदि चार युग संध्या (युगारंभ के पहले का काल) और संध्यांश (युगांत के बाद का काल) के साथ 12000 वर्ष परिमित होते हैं। चार युगों का मान 4000 + 3000 + 2000 + 1000 = 10000 वर्ष है; संध्या का 400 + 300 + 200 + 100 = 1000 वर्ष; संध्यांश का भी 1000 वर्ष है। युगों का यह परिमाण दिव्य वर्ष में है। दिव्य वर्ष = 360 मनुष्य वर्ष है; अत: 12000 x 360 = 4320000 वर्ष चतुर्युग का मानुष परिमाण हुआ। तदनुसार सत्ययुग = 1728000; त्रेता = 1296000; द्वापर = 864000; कलि = 432000 वर्ष है। ईद्दश 1000 चतुर्युग (चतुर्युग को युग भी कहा जाता है) से एक कल्प याने ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष है। 71 दिव्ययुगों से एक मन्वंतर होता है। यह वस्तुत: महायुग है। अन्य अवांतर युग भी है। प्रत्येक संख्या में ३६० के गुणा करना होता है क्योंकि और कलियुग जो की १२०० दिव्यवर्ष अवधि का था वह मानव वर्षों के रूप में ४३२००० वर्ष का बना होता है चारों युगों की अवधि इस प्रकार है सत्य 17,28,000 वर्ष ,त्रेता 12,96,000 वर्ष ,द्वापर 8,64,000 वर्ष कलियुग 4,32,000 वर्ष चारों युगों का जोड़ 43,20,000 वर्ष यानी एक चतुर्युग | दुसरी गलती यह हुई कि जब द्वापर समाप्त हुआ तो उस समय २४०० वा वर्ष चल रहा था जब कलियुग शुरू हुआ तो उसको कलियुग प्रथम वर्ष लिखा जाना चाहिए था लेकिन लिखा गया कलियुग २४०१ तो जो कहा जाता है की २०२२ में कलियुग शुरू हुए ५१२३ वर्ष हो गए हैं उसमे से त्रुटिपूर्ण जुड़े २४०० वर्ष निकालने होंगे शेष बचे २७२४ वर्ष ही सही अंक है | यह कहा गया कलियुग के बाद सत्ययुग आएगा ये व्यवहारिक नहीं है कलियुग की आखरी रात्री सोयेंगे सुबह उठेंगे तो सब कुछ सही होगा हर व्यक्ति सतोगुणी होगा यह संभव तभी होगा जब कल्कि अवतार के बाद भगवान धर्म की स्थापना करेंगे। पतन जिस प्रकार धीरे धीरे हुआ उसी प्रकार उत्थान होगा अधोगामी कलियुग के बीतने पर उर्ध्वगामी कलियुग की शुरुआत होगी फिर द्वापर फिर त्रेता फिर सत्ययुग आएगा |इंसान केवल अपनी बुद्धि लगा कर वेद धर्मशास्त्र का अर्थ निकाल सकता है उसके बिल्कुल सत्य भाव को व्यक्त नहीं कर सकता है अतः मानव बुद्धि से गलती की बहुत संभावना होती है यंहा म़ैं यह बताना चाहूंगा कि कलियुग का महायुग आज से 8911साल पहले शुरू हों गया था तब महाभारत काल था ओर त्रिदेव युग के अंदर कलियुग 911 ईस्वी सन से शुरू हो गया यदि कलियुग आदि शंकराचार्य कि मृत्यु के तुरुंत बाद शुरू माना जाय तो 2038 में कलियुग समाप्त हो जाएगा।

🔱युगधर्म

मुख्य लेख: युगधर्म

सूर्य अपने महा केंद्र (ब्रह्मा) के चक्कर लगाता है इसके एक चक्कर मे पृथ्वी के 24000 वर्ष लगते हैं इसमे 12000 वर्षों (चार युग की अवधि)का एक आरोही अर्धचक्र तथा 12000 (चार युग की अवधि)वर्षों का एक अवरोही अर्धचक्र होता है ।

अवरोही अर्धचक्र में 12000 वर्षों में सूर्य अपने महाकेन्द्र से सबसे दूरस्थ स्थान तक पहुंचता है तब धर्म का ह्रास होते होते वह इतनी निकृष्ठ अवस्था मे पहुंच जाता है इस काल मे मनुष्य स्थूल जगत से परे कुछ भी समझ नहीं पाता था युद्ध तलवारों से लड़े जा रहे थे । उसी प्रकार आरोही अर्धचक्र में सूर्य जब महकेन्द्र के सबसे निकट स्थान की ओर बढ़ना शुरू करता है तब धर्म भी उन्नत होना शुरू हो जाता है । यह विकास 12000 वर्षों में धीरे धीरे पूर्ण होता है । इन दोनों आरोही या अवरोही चक्रों में प्रत्येक को एक दैव युग कहते हैं ।

धर्म (मानसिक सद्चरित्रता) की उन्नति धीरे धीरे होती है और 12000 वर्षों की अवधी में यह चार अवस्थाओं में विभाजित होती है -

⚜️कलि युग - 1200 वर्ष (जब सूर्य अपने परिक्रमा पथ के 1/20 हिस्से में भ्रमण करता है) धर्म अपनी प्रारंभिक अवस्था मे होता है । मनुष्य की बुद्धि नित्य परिवर्तनशील वाह्य जगत से अधिक कुछ भी समझने में असमर्थ होती है ।

⚜️द्वापर युग - 2400 वर्ष (जब सूर्य अपने परिक्रमा पथ के 2/20 हिस्से में भ्रमण करता है) इस काल मे धर्म अपनी द्वितीय अवस्था मे पहुंच जाता है । मनुष्य की बुद्धि वाह्य जगत का सृजन करने वाले सूक्ष्म तत्वों और उनके गुणों को समझने लगती है ।

⚜️त्रेता युग - 3600 वर्ष (जब सूर्य अपने परिक्रमा पथ के 3/20 हिस्से में भ्रमण करता है) धर्म तृतीय अवस्था मे पहुंच जाता है । मनुष्य की बुद्धि समस्त विद्युत शक्तियों के मूल स्रोत अर्थात ईश्वरीय चुम्बकीय शक्ति को समझने में समर्थ हो जाती है ।

⚜️सत्ययुग - 4800 वर्ष (जब सूर्य अपने परिक्रमा पथ के 4/20 हिस्से में भ्रमण करता है) धर्म चौथी अवस्था मे पहुंच कर पूर्ण विकसित हो जाता है । बुद्धि सब कुछ समझने के योग्य हो जाती है । सृष्टि से परे परब्रह्म का भी पूर्ण ज्ञान हो सकता है । सत्ययुग में हुए महान ऋषि मनु ने अपनी मनु सहिंता में स्पष्ट वर्णन किया है-

चत्वार्याहु: सहस्त्राणि वर्षणान्तु कृतं युगम ।त

स्य तावच्छति संध्याम संधाश्च तथाविध: ।।

इतरेषु ससंध्येशु ससंध्यानशेषु च त्रिषु ।

एकपायेन वर्तन्ते सहस्त्राणि शतानि च ।।

यदेतत परिसंख्यातमादावेव चतुर्युगम ।

एतद द्वादशसाहस्र देवानां युगमुच्यते ।।

देवीकानां युगानान्तु सहस्रं परिसंख्यया ।

ब्रह्ममेकमहर्ज्ञेयम तावती रात्रिरेव च ।।

कृत युग या सत्ययुग चार हज़ार वर्षों का होता है उसके उदय की संधि के उतने ही सौ वर्ष और अस्त की संधि के भी उतने ही सौ वर्ष होते हैं

इसके आगे के युग और युग संधी प्रत्येक क्रमश 1000 और 100 वर्षों के हिसाब से घट जाती हैं । उदाहरण-

⚜️सत्ययुग (400+4000+400=4800)

⚜️त्रेता (300+3000+300=3600)

⚜️द्वापर (200+2000+200=2400)

⚜️कलियुग (100+1000+100=1200)

चारों युगों (चतुर्युग)की अवधि का जोड़ एक दैव युग(12000 वर्ष) कहते हैं ।

1000 दैव युगों से ब्रह्मा का एक दिन बनता है और इतने ही दैव युगों से ब्रह्मा की एक रात ।

ब्रह्मा वह महा केंद्र है जिसके चक्कर सूर्य 24000 वर्षों में लगाता है ।

ईसा पूर्व सन 11501 में जब शारदीय विषुव मेष राशि के प्रथम बिंदु पर था तब सूर्य का अपने परिक्रमा मार्ग में महकेन्द्र के निकटतम बिंदु से दूरस्थ बिंदु की ओर प्रस्थान शुरू हुआ और उसी के साथ मानव की बुद्धि क्षीण होने लगी । 4800 वर्ष(सत्ययुग) के अंत तक आध्यात्मिक ज्ञान को समझने की शक्ति को खो दिया 3600 वर्ष(त्रेतायुग) चुम्बकीय ज्ञान को समझने की शक्ति का ह्रास 2400 वर्ष (द्वापर) विद्युत शक्तियों को समझने की शक्तियों का ह्रास अगले 1200 वर्ष (कलियुग) पूर्ण होने पर ईसवी सन 499 में सूर्य अपने महकेन्द्र से दूरस्थ बिंदु पर आ गया था। भौतिक जगत से परे कुछ भी समझ पाने की क्षमता मनुष्य में नहीं रही थी । इस प्रकार 499 ईसवी पूरे युगचक्र (24000 वर्ष) का सबसे अंधकारमय काल था इसके पश्चात सूर्य अपने महकेन्द्र के निकटतम बिंदु की ओर बढ़ने लगा और मानव की बुद्धि धीरे धीरे विकसित होने लगी इस उर्ध्वगामी कलियुग के 1100 वर्षों (ईसवी सन 1599) तक मानव बुद्धि जड़ होने के कारण सूक्ष्म शक्तियों का ज्ञान नहीं था राजनीतिक स्तर पर भी कहीं शांति नहीं थी।

इस काल के बाद आरोही द्वापर युग से पहले कलियुग के संधिकाल के 100 वर्षों में विधुयुत शक्तियों सूक्ष्म तत्वों का पुनः ज्ञान होना शुरू हुआ ।

कलियुग के अंत मे दशम अवतार कहीं दसवे गुरु गोविंद सिंह जी ही तो नहीं जिनका जन्म 1666 और निर्वाण 1708 में हुआ था ।

ईसवी सन 1600 में गिल्बर्ट ने चुमवकीय शक्तियों को 1601 में केप्लर ने खगोल विज्ञान के नियमों को गैलीलियो ने टेलेस्कोप को 1621 में ड्रेबल ने माइक्रोस्कोप 1670 में नूतन ने गुरुत्वाकर्षण नियम 1700 में सेवरी ने स्टीम इंजन से पानी खींचने 1720 में स्टीफन ग्रे ने मानव शरीर पर विद्युत शक्ति के परिणाम को पूनह बताया । विज्ञान की पुनः प्रगति के साथ विश्व भर में रेलवे और टेलीग्राफिक तारों का जाल बीच गया ।

1899 में द्वापर युग की संधि के 200 वर्ष पूर्ण होकर 2000 वर्ष अवधि के वास्तविक द्वापर युग की शुरुआत हुई जिसमे विद्युत शक्तियों और उनके गुणधर्म का पूर्ण ज्ञान मानव प्राप्त करेगा।

वर्तमान पंचांगों में कलियुग 432000 वर्षों का क्यों दर्शाया गया है -------

ऐसा होने का कारण है मनुस्मृति में दिए सूत्र में कलयुग की अवधि पृथ्वी के 1200 वर्षों को 1200 दैववर्ष मान लेना जिसमे 30 -30 दैव दिनों के 12 दैव महीने होते हैं और एक दैव दिन पृथ्वी के 1 वर्ष के बराबर होता है ।

इस प्रकार 1200 दैव वर्ष =1200×30×12 = 432000 दैव दिवस = 432000 सौर वर्ष

यह गलती राजा परीक्षित के दरबारी पंडितों के गलत गड़ना के आधार पर हुई है राजा युधिष्ठिर ने जब कलियुग के आगमन से पूर्व हिमालय में जाने का निश्चय किया तो उनके साथ उनके दरबार के सभी ज्ञानीजन भी कलियुग को देखने की अनिच्छा से हिमालय चले गए महाराजा परीक्षित के दरबार मे कोई ऐसा ज्ञानीजन न बचा जो युग युगांतर की कालगड़ना का ज्ञान रखता हो अतः उस समय चल रहे द्वापर युग के 2400 वर्ष में एक कि संख्या जोड़ कर कलियुग के प्रथम वर्ष के स्थान पर 2401 लिखा गया क्योंकि कलियुग के शुरू होने पर बुद्धि अपने निम्नतर स्तर पर चली गयी और यह गलती किसी के ज्ञान में न आई इस प्रकार 1200 वर्ष अवरोही कलियुग के बीतने पर सन 499 ईसवी में कलियुग के चरम बिंदु आया और 1200 वर्ष अवधि का उर्ध्वगामी कलियुग शुरू हुआ जो ईसवी सन 1699 में समाप्त हुआ (गुरु गोविन्द सिंह जी जिनका जन्म कलियुग के आखिरी चरण में सन १६६६ में जन्म लिया और कलियुग की समाप्ति १६९९ के बाद १७०८ में निर्वाण प्राप्त किया शोध का विषय है वही कल्कि अवतार तो नहीं थे ?) और द्वापर के संधिकाल 200 वर्ष की शुरुआत हुई जो 1899 में समाप्त हुआ तब से आज सन 2017 तक 117 वर्ष बीत चुके हैं यानी द्वापर का 318 वा वर्ष चल रहा है ।

यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि कलियुग की समाप्ति पर सीधा सत्ययुग नहीं आता पहले द्वापर फिर त्रेता फिर सत्ययुग आता है सुधार धीरे धीरे होता है रातों रात नहीं । ऐसा संभव नहीं हैं कि कलियुग के आखरी दिन सोये सुबह उठे तो सब कुछ सत्ययुग में अच्छा अच्छा था ।

कहा जाता है २०१८ में कलियुग के 5120 वा वर्ष चल रहा है अब इसमें से द्वापर के 2400 वर्ष घटाने पर (क्योंकि द्वापर के 2400 वर्ष पूर्ण होने पर 1 जोड़ कर ही कलियुग की गिनती शुरू की गई थी)2720 वर्ष शेष रहते हैं जिसमे आरोही कलियुग के 1200 और अवरोही कलियुग के 1200 वर्ष घटाने पर 320 वर्ष शेष रहते हैं जो वर्तमान में द्वापर के 320 वे वर्ष को प्रदर्शित करते हैं।

केवल्य दर्शनम नामक पुस्तक में दिए ज्ञान पर आधारित।

🔱वैज्ञानिक प्रमाण

भगवान श्री राम जी के जन्म-समय पर आधुनिक शोध

युगधर्म का विस्तार के साथ प्रतिपादन इतिहास पुराणों में बहुत मिलता है (देखिये, मत्स्यपुरण 142-144 अ0; गरूड़पुराण 1.223 अध्यय; वनपर्व 149 अध्याय)। किस काल में युग (चतुर्युग) संबंधी पूर्वोक्त धारण प्रवृत्त हुई थी, इस संबंध में गवेषकों का अनुमान है कि खोष्टीय चौथी शती में यह विवरण अपने पूर्ण रूप में प्रसिद्ध हो गया था। वस्तुत: ईसा पूर्व प्रथम शती में भी यह काल माना जाए तो कोई दोष प्रतीत नहीं होता।

🔱कलियुग का आरम्भ

विद्वानों ने कलियुगारंभ के विषय में विशिष्ट विचार किया है। कुछ के विचार से महाभारत युद्ध से इसका आरंभ होता है, कुछ के अनुसार कृष्ण के निधन से तथा एकाध के मत से द्रौपदी की मृत्युतिथि से कलि का आरंभ माना जा सकता है। यत: महाभारत युद्ध का कोई सर्वसंमत काल निश्चत नहीं है, अत: इस विषय में अंतिम निर्णय कर सकना अभी संभव नहीं है।

सोमवार, 23 मई 2022

पर सम्बन्ध विवेचना

 ।।👾हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे ।।👾

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👉|||||||| व्यभिचार योग अर्थात्‌ अवैध सम्बंध---

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 👉विवाह पूर्व या विवाहेतर संबंध आज एक आम बात हो गई है। हम भले ही किसी के चेहरे को देखकर इसका पता नहीं चला सकते पर कुण्डली से इस तरह के अवैध संबंधों का पता लगाया जा सकता है।


 👉 हिन्दुस्तान का वो मीठा जहर है जो शरीर में धुल कर आत्मा को भी अपवित्र कर देता है, अवैध संबंध का तात्पर्य सिर्फ शरीर से ही नहीं अपितु मन, वचन, कर्म तथा रक्त के द्वारा सम्पूर्ण भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल को दूषित करने के साथ-साथ बच्चों एवं परिवार की नजरों में मनुष्यों को तुच्छ बनाकर घृणित कर्म मार्ग पर ला कर खड़ा करता हैं। अवैध संबंधों के लिए कोई एक दोषी नहीं होता, स्त्री और पुरुष दोनों से मिलकर ही अवैध संबंध का निर्माण होता है। विवाहित या अविवाहित कोई भी पुरुष अथवा स्त्री हो, जो अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य से यौन संबंध स्थापित करें तो उसकी गिनती अवैध संबंधों में होती है इसके लिए केवल स्त्री ही जिम्मेदार नहीं बल्कि इसमें पुरुष वर्ग का विशेष हाथ होता है, किन्तु पुरुष के अवैध संबंध के लिए स्त्री ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इस सत्य को स्वीकार करना आसान नहीं है क्योंकि सत्य बड़ा कठोर होता है। पुरुष जब किसी अन्य स्त्री से अवैध संबंध स्थापित करने के लिए छल, दुष्टपूर्ण नीतियों और कुटिलताओं से स्त्री को आकर्षित करने की चेष्टा करता हैं तो स्त्री अगर उस समय चाहे तो कोई भी संसार का पुरुष उसको उसके मन के विरुद्ध  किसी अन्य मार्ग पर नहीं ले जा सकता, ये शक्ति नारी जाति में स्वत: व्याप्त है किन्तु इसको समझना या ना समझना ये भिन्न-भिन्न स्त्रियों पर निर्भर करता है फिर भी कई बार इस तरह की परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं कि पुरुष किसी दूसरी स्त्री के सम्पर्क में चला जाता है या स्त्री किसी अन्य पुरुष का साथ चाहने लगती है इसका सीधा संबंध पति अथवा पत्नी की कामवासना, प्यार और सांसारिक वस्तुओं को प्राप्त करने से होता है।


 👉अवैध संबंध का सीधा अर्थ यौन इच्छा से है, पति द्वारा प्यार-प्रेम, मान और सम्मान न मिलने के कारण भी कई स्त्रियां किसी परपुरुष का संग चाहती है ताकि वो अपने मन में दबी भावनाओं को प्रकट कर सके, इसी अवसर का लाभ उठाकर कई दुष्ट प्रवृत्ति के पुरुष उसके स्त्रीतत्व को भंग कर अवैध संबंध बना लेते हैं।


 👉 कामवासना भी शरीर और जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है इसकी तृप्ति करना भी परमावश्यक है किन्तु वासना की तृप्ति के साथ प्रेम का रस मिला देने से वो 'योग' बनता है, जिससे सृष्टि का निर्माण होता है इसलिए पति अथवा पत्नी दोनों को अपने जीवनसाथी के साथ दाम्पत्य जीवन में वासना के साथ प्रेम का निर्माण भी करना चाहिए, एक दूसरे की वेदना और भावना को समझना चाहिए। पति अथवा पत्नी दोनों में से कोई भी एक यौनक्रिया में सफल ना भी हो, तो भी अगर दोनों में प्रेम है तो उनका ​शुद्ध​  प्रेम कामवासना पर विजय प्राप्त कर अवैध संबंध जैसे जहर पर अंकुश लगा सकता है।


 👉ज्योतिष शास्त्र में अवैध संबंध जैसे विषय पर भी स्पष्टता मिलती है चन्द्रमा मन का कारक होता है और कामवासना मन से जागती है। लग्न व्यक्ति स्वयं होता है पंचम भाव प्रेमिका और सप्तम भाव पत्नी का होता है एवं शुक्र भोग विलास का कारक है, शनि, राहू, मंगल और पंचम भाव, पंचमेश, द्वादश और द्वादशेश का आपस में संबंध होना जातक के विवाह पूर्व एवं पश्चात अवैध संबंध स्थापित करवाते हैं। जन्म कुंडली में सप्तम भाव पर शनि की चन्द्रमा के साथ युति जहां जातक को मानसिक रूप से पीड़ित करती है वहीं प्रेम संबंध भी करवाती है। कुछ ऐसे ज्योतिषीय योगों का उल्लेख कर रहा हूं, जिनके जन्म कुंडली में होने से, जातक का अवैध संबंध और कामुक होने का संकेत मिलता है:


1-👉--जन्म कुंडली में शनि और शुक्र की युति, वैवाहिक जीवन में किसी अन्य का आना बताता है।


-2-👉-  पंचम भाव में शनि, शुक्र और मंगल की युति अवैध संबंध का निर्माण करती है।


3-👉--  मेष या वृश्चिक राशि में मंगल के साथ शुक्र के होने से पराई स्त्री से घनिष्ठा बनती है।


--4--👉  जन्म कुंडली में चन्द्रमा से द्वितीय स्थान में शुक्र हो तो 'सुनफा योग' बनता है । ऐसा जातक भौतिक सुखों की प्राप्ति करता हैं उसका सौन्दर्य आकर्षक होता है अन्य स्त्रियों से शारीरिक संबंध की प्रबल संभवना होती है।


-- 5--👉 द्वितीय, छठे और सप्तम भाव के किसी भी स्वामी के साथ शुक्र की युति लग्न में होने से जातक का चरित्र संदेहप्रस्त होता है।


-6--👉-  सूर्य और शुक्र की युति मीन लग्न में होने से जातक को अत्यंत कामुक बनाती है उसका अवैध संबंध बनता है तथा ऐसे जातक की  कामवासना की तृप्ति शीघ्र नहीं होती।


7--👉--  बुध और शुक्र की युति यदि सप्तम भाव में हो तो जातक अवैध संबंधों के लिए नूतन तरीके अपनाता हैं।


-8--👉-  शनि, मंगल और शुक्र का काम वासना से घनिष्ठ संबंध है यदि जन्म कुंडली में शनि और मंगल की युति सप्तम भाव पर हो तो जातक समलिंगी होता है। ये ही युति यदि अष्टम, नवम, द्वादश भाव पर हो तो जातक का अपने बड़ों से अवैध संबंध होता हैं।


-9--👉- मंगल और राहू की युति अथवा दृष्टि शुक्र पर हो तो जातक कामुक होता है एवं अवैध संबंध बनाने के लिए उसका मन भटकता है।


10--👉-- लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम भाव में गुरु पर मंगल शुक्र का प्रभाव और चन्द्रमा पर राहू का प्रभाव हो तो व्यक्ति अवैध संबंध बनाने के लिए सभी सीमाओं का उल्लंघन कर देता है।


-11--👉-  लग्न में शनि का होना जातक को कामवासना अधिक देता है, पंचम भाव में शनि होने से अपने से बड़ी स्त्रियों के प्रति अवैध संबंध बनाने के लिए जातक को आकर्षित करता है।


12--👉--  शनि का सप्तम भाव में चन्द्रमा के साथ होना और मंगल की दृष्टि पड़ने से जातक वेश्यागामी होता है इसी योग में अगर शुक्र का संबंध दृष्टि अथवा युति से बन जाए तो अवैध संबंध निश्चित हो जाता है।


--13---👉  चन्द्रमा जन्म कुंडली में कहीं पर भी नीच को होकर बैठा हो और उस पर पाप प्रभाव हो तो जातक अपने नौकर/नौकरानी से अवैध संबंध बनवाता है यहीं चन्द्रमा अगर दूषित होकर नवम भाव में स्थित हो तो जातक अपने गुरु अथवा अपने से बड़ों के साथ अवैध संबंध बनाता है।


--14--👉  मंगल रक्त को दर्शता है जन्म कुंडली में किसी पाप ग्रह के साथ मंगल की युति सप्तम भाव में हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ स्थान में हो अथवा चतुर्थ भाव में राहू हो तो व्यक्ति कामुकता में अंध होकर पशु समान कार्य करता है।


--15--👉  राहू का अष्टम भाव में होना जातक का अवैध संबंध कराता है।


--16--👉 तुला राशि में चार ग्रह एक साथ होने से जातक के परिवार में कलेश उत्पन्न करते है जिसके कारण जातक बाहर अवैध संबंध बनाता है।


17--👉-- शनि का दशम भाव में होना जातक के मन में विरोधाभास उत्पन्न करता है। शुक्र और मंगल की युति जन्म कुंडली में कहीं पर भी हो एवं शनि दशम भाव में हो तो जातक ज्ञानवान भी होता है एवं काम वासना और अवैध संबंधों को गंभीरता से लेता है उसका मन स्थिर नहीं रह पाता, कभी ज्ञानी बन जाता है कभी अवैध संबंधों का दास।


18---👉-- बुध और शनि का संबंध सप्तम भाव से हो तो ऐसे जातक यौनक्रियाओं में नीरस एवं अयोग्य होते हैं।


19--👉--  सूर्य का सप्तम भाव में होना जातक के वैवाहिक जीवन में कलेश उत्पन्न करता है, इससे परेशान होकर जातक अवैध संबंध बनाता है।


20--👉-- सप्तम भाव में राहू और शुक्र हो अथवा राहू और चन्द्रमा की युति हो तथा गुरु द्वादश भाव में स्थित हो तो विवाह पश्चात कार्यालयों में ही अवैध-संबंध बनते हैं। 


-21-👉-  बुध और शनि की युति यदि द्वादश भाव में हो तो जातक शीघ्रपतन का रोगी बन जाता है और इसी योग में यदि लग्न, सप्तम और अष्टम भाव में राहू हो तो व्यक्ति अपनी जवानी को स्वयं नष्ट करता है एवं उसका जीवनसाथी किसी अन्य से शरीरिक तृप्ति लेता है।


-22--👉-  मंगल जोश और शुक्र भोग एवं द्वादश भाव अवैध संबंध में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है यदि मंगल, शुक्र और द्वादश भाव का स्वामी का संबंध सप्तम भाव से हो तो व्यक्ति लंपट होता है एवं कई स्त्रियों से उसका अवैध संबंध होता है। इन्हीं तीनों का योग चतुर्थ या द्वादश भाव में हो तो जातक अत्यंत कामी होता है और अपने जीवन में मर्यादा त्याग कर अधिक अवैध संबंध बनाता है।  लग्नेश एकादश में स्थित हो और उस पर पाप प्रभाव हो तो जातक अप्राकृतिक यौनक्रियाएं की तृप्ति हेतु अवैध संबंध बनाता है। 


 23---👉 जन्म कुंडली में चन्द्रमा, मंगल, शुक्र, राहू, सप्तम भाव, पंचम भाव और द्वादश भाव अवैध संबंध का निर्माण करते हैं। 


24--👉मंगल शारीरिक शक्ति का कारक है तथा विवाह के पश्चात जो संबंध बनते हैं उसको भी दर्शाता है। शुक्र तो स्वयं भोग विलास है, विपरित लिंग व अन्यों को आकर्षित कराता है, कामेच्छा जगाता है, रोमांस देता है। शनि वैराग्य भी देता है, आलोचना और योगों में अवैध संबंधों के कारक का भी कार्य करता है l


विशेष ---👉अवैध संबंधों के योगों को देखने से पूर्व जन्म कुंडली में शुभ ग्रहों, और अन्य योगों का भी निरीक्षण करना चाहिए क्योंकि कई बार ऐसा होता है जन्म कुंडली में अवैध संबंध योग बन रहा है किन्तु वहीं पर जन्म कुंडली मेें पतिव्रता/एक पत्नीव्रत का भी योग है इन दोनों योगों में से जो योग बलवान होगा जातक वैसा ही होगा। शुक्र और सूर्य की युति लग्न में जहां व्यक्ति को व्याभिचार देती है वहीं किसी शुभ ग्रह की युति अथवा दृष्टि उसके व्याभिचार योग को नष्ट कर देती है। ऐसे ही मंगल और शुक्र की युति पंचम भाव में अवैध संबंध के स्थान पर प्रेम भी देती है अत: जन्म कुंडली का पूर्ण निरीक्षण करने के पश्चात ही फलादेश करना चाहिए।

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सोमवार, 25 अप्रैल 2022

हृदय रेखा और ईष्ट

 हाथ की रेखाएं बता देती हैं कि किस देवी-देवता की पूजा आपके लिए ज्यादा लाभकारी होगी ।

- यदि आपेक हाथ की हृदय रेखा पर त्रिशूल बनता हो, उंगलियां चाहे टेढ़ी-मेढ़ी हों तो ऐसे लोंगो के ईष्ट देव भगवान शिव माने जाते है और उन्हें जीवन में आने वाले कष्टों से मुक्ति के लिए शिव की आराधना करना चाहिए, एवं इस मंत्र- ऊँ नमः शिवाय का जप 108 बार करना चाहिए ।


- यदि हृदयरेखा के अंत पर एक शाखा गुरु पर्वत पर जाती हो तो इन्हें रांम भक्त श्री हनुमान जी का पूजन करना चाहिए, जो जीवन में आने वाली विपदाओं को दूर करते है, साथ ही इस मंत्र का 108 बार जप- ऊँ नमो हनुमंता एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से सुख शांति मिलती है ।


- यदि भाग्य रेखा खंडित हो व इसमें दोष हो तो ऐसे लोगों को लक्ष्मी माता का ध्यान या लक्ष्मी मंत्र का जप करना चाहिए । मात लक्ष्मी को ईष्ट मानकर इस मंत्र - ऊँ श्रीं, ह्रीं, श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं सिद्ध लक्ष्म्यै नमः । का जप करना चाहिए ।


- यदि हाथ में सूर्य ग्रह दबा हुआ हो, व्यक्ति को शिक्षा में पूर्ण सफलता न मिल पा रही हो, मस्तिष्क रेखा खराब हो, तो सूर्य ईष्ट मानकर सूर्य मंत्र का 108 बार जप करने के बाद सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए । सूर्य मंत्र- ऊँ ह्रां, ह्रीं, ह्रौं सः सूर्याय नमः ।


5- यदि जीवन रेखा व भाग्य रेखा को कई मोटी रेखाएं काटें तो इनके जीवन में प्रत्येक व्यवसाय में रुकावट आती है तो इस रुकावट को दूर करने के लिए इस मंत्र - ऊँ श्रीं, ह्रीं, श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं सिद्ध लक्ष्म्यै नमः । का जप करना चाहिए ।


6- यदि सभी ग्रह सामान्य हों, जीवन रेखा टूटी हो तो ये जीवन में दुर्घटनाओं का ***** है । ऐसे लोगों को भगवान शिव को ईष्ट मानकर शिव स्तोत्र या ऊँ नमः शिवाय का जप नियमित करना चाहिए ।


7- यदि हृदय रेखा खंडित हो और साथ में हृदय रेखा से अनेक शाखाएं मस्तिष्क रेखा पर आ रही हों तो इन्हें मां दुर्गा का पूजन तथा दुर्गा सप्तशती का नित्य पाठ करना चाहिए । ऐसा करने से मन का विचलन शांत होता है तथा इससे उसकी निर्णय क्षमता में वृद्धि होने लगती है ।


8- यदि हृदय रेखा व मस्तिष्क रेखा एक हो या मस्तिष्क रेखा मंगल क्षेत्र तक जाती हो तो इन्हें भगवान कृष्ण का ध्यान व पूजा करनी चाहिए, साथ ही इस मंत्र- ऊँ नमोः भगवते वासुदेवाय नमः का जप 108 बार करना चाहिए । इससे व्यक्ति को संतान सुख व वंश की प्राप्ति होती है ।


- यदि हाथ में भाग्य रेखा लंबी हो, जीवन रेखा गोल हो, हृदय रेखा सुंदर हो तो इन्हें मर्यादा पुरुषोम श्रीराम को ईष्ट मानकर पूजन करना चाहिए । ऐसे लोग राम नाम का 1100 बार जप करने से जीवन सुखमय बन जाता है ।


यदि हाथ में शनि की अंगुली सीधी हो, शनि ग्रह मध्य हो तो ऐसे व्यक्तियों को शनि देव की स्तुति अवश्य करनी चाहिए । नित्य शनि मंत्र का 108 बार जप करने से मनुष्य के जीवन में सुख शांति व समृद्धि आती है । शनि मंत्र - ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सह शनिश्चराय नमः ।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

श्रीराम जन्म रहस्य

 II जय श्रीराघव II


“ श्रीरामजन्म रहस्य “

पोस्ट संख्या – ४/४ (अन्तिम)


कुछ महानुभवोंका मत है कि सांगोपांग शेषशायी भगवान् का आविर्भाव चार रूपोंमें होता है । साक्षात् भगवान् श्रीरामरूपमें और शेष, शंख, चक्र ये लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न रूपमें प्रकट होते हैं । आधे अंशमें राम और आधेमें लक्ष्मण प्रभृति तीनों भ्राता । दूसरे शब्दोंमें यह भी कहा जा सकता है कि सप्रपञ्च ब्रह्मका भरतादि तीन रूपमें प्राकट्य हुआ और निष्प्रपञ्च ब्रह्मका श्रीरामरूपमें आविर्भाव हुआ ।


प्रणवके ‘अ’ ‘उ’ ‘म्’ इन तीन मात्राओंके वाच्य विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृतका शत्रुघ्न, लक्ष्मण तथा भरतरूपमें आयर अर्द्धमात्राका अर्थ तुरीयपाद या वाच्यवाचकातीत, सर्वाधिष्ठान परम तत्त्वका श्रीरामरूपमें प्रादुर्भाव हुआ । निष्प्रपञ्च अर्द्धमात्राका अर्थ तुरीय तत्त्व ही चरुके अर्द्ध अंशसे और शेष तीन मात्राओंके अर्थ सप्रपञ्च तीनों तत्त्व चरुके अर्द्ध अंशसे व्यक्त हुए । प्रणवकी जैसे साढ़े तीन मात्रा मानी गयी है, वैसे ही सोलह मात्र भी मानी जाती है । ‘अकारो वै सर्वा वाक् ।‘ समस्त वाक्योंका अन्तर्भाव अकारमें ही होता । अतः प्रणवमें ही सोलह मात्राकी कल्पना करके उसके सोलह वाच्य स्थिर किये गये हैं । जाग्रत-अवस्थाका अभिमानी व्यष्टि विश्व और समष्टि स्थूल प्रपञ्चका अभिमानी विराट् होता है । सूक्ष्म प्रपञ्च और स्वप्नावस्थाका अभिमानी तैजस और हिरण्यगर्भ एवं कारण प्रपञ्च, सुषुप्ति-अवस्थाका अभिमानी प्राज्ञ और अव्याकृत होता है ।इन सभी कल्पनाओंका अधिष्ठान शुद्ध ब्रह्म तुरीय तत्त्व होता है ।


इस पक्षमें ‘तुरीय विराट्’ शत्रुघ्न, ‘तुरीय हिरण्यगर्भ’ लक्ष्मण, ‘तुरीय अव्याकृत’ भरत और ‘तुरीय तुरीय’ श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्ररूपमें प्रकट होते हैं, और उनकी माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति, श्रीजनक-नन्दिनीरूपमें प्रकट होती हैं । सर्वथा पूर्णतम पुरुषोत्तम वेदान्तवेद्य भगवान् का ही श्रीरामचन्द्र-रूपमें प्राकट्य होता है तभी तो उनके दर्शन, स्पर्शन, श्रवण, अनुगमन मात्रसे प्राणियोंकी परमगति हो जाती है –

स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा ।

कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः ।।

जो परम तत्त्व विषय, करण, देवताओं तथा जीवको भी सत्ता-स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है, वही श्रीरामचन्द्ररूपमें प्रकट होता है ।


बिषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ।।

सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ।।

समष्टि-व्यष्टि, स्थूल-सूक्ष्मकारण समस्त प्रपञ्चमय क्षेत्रके कूटस्थ निर्विकार भासक ही राम हैं – ‘ जगत प्रकास्य प्रकासक रामू ।‘

जिनके अनुग्रहसे एवं जिनमें सब रमण करते हैं और जो सर्वान्तरात्मा रूपसे सबमें रमण करते हैं वे ही मर्यादापुरुषोत्तम रामचन्द्र हैं । जिन आनन्दसिन्धु सुखराशिके एक तुषारसे अनन्त ब्रह्माण्ड आनन्दित होता है वे ही जीवोंके जीवन, प्राणोंके प्राण, आनन्दके भी आनन्द भगवान् ‘राम’ हैं ।

(गोताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित ‘कल्याण – श्रीरामभक्ति अंक’से)

******* सियावर रामचन्द्रकी जय *******