शनिवार, 20 सितंबर 2025
#स्वधास्तोत्रम"* *मंत्र*:-*।।ॐ ऐं सर्व पितृभ्यो स्वधा।।* _*ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।*_ _*नम: स्वाहायै स्वाधायै नित्यमेव नमो नम:।।*_ *"स्वधास्तोत्रम"**स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नर:।**मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्।।1।।**स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्।**श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च।।2।।**श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं य: श्रृणोति समाहित:।**लभेच्छ्राद्धशतानां च पुण्यमेव न संशय:।।3।।**स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर:।**प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्।।4।।**पितृणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी।**श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा।।5।।**बहिर्गच्छ मन्मनस: पितृणां तुष्टिहेतवे।**सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे।।6।।**नित्या त्वं नित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते।**आविर्भावस्तिरोभाव: सृष्टौ च प्रलये तव।।7।।**ॐ स्वस्तिश्च नम: स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा।**निरूपिताश्चतुर्वेदे षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्।।8।।**पुरासीस्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिकासखी।**धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता।।9।।**इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि।**तस्थौ च सहसा सद्य: स्वधा साविर्बभूव ह।।10।।**तदा पितृभ्य: प्रददौ तामेव कमलाननाम्।**तां सम्प्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिता:।।11।।**स्वधास्तोत्रमिदं पुण्यं य: श्रृणोति समाहित:।**स स्नात: सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत्।।12।।**।।इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे ब्रह्माकृतं स्वधास्तोत्रं सम्पूर्णम्।।*
मंगलवार, 22 अप्रैल 2025
पोप का निधन
राजकीय शोक के दौरान क्या-क्या होता है?
1.झंडा आधा झुका दिया जाता है (National Flag at Half Mast):पूरे देश या राज्य की सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुकाया जाता है।
केवल स्मरण या श्रद्धांजलि हेतु झंडा झुकाया जाता है, कोई अन्य कार्य नहीं किया जाता।
सभी प्रकार के सरकारी समारोह, सांस्कृतिक, मनोरंजन और उद्घाटन कार्यक्रम स्थगित या रद्द कर दिए जाते हैं।
अगर, कोई सार्वजनिक रूप से निर्धारित कार्यक्रम पहले से तय हो, तो उसे भी टालने का प्रयास किया जाता है।
सिनेमा हॉल, थिएटर और अन्य मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियाँ कुछ स्थानों पर बंद रहती हैं।
टेलीविजन और रेडियो चैनल्स भी उस दिन सांस्कृतिक या मनोरंजन कार्यक्रम नहीं दिखाते, बल्कि श्रद्धांजलि से जुड़ी सामग्री प्रसारित करते हैं।
आमतौर पर सरकारी दफ्तर और स्कूल/कॉलेज खुले रहते हैं, जब तक कि विशेष आदेश न हों।
लेकिन किसी शीर्षस्थ नेता के निधन पर इन्हें भी एक दिन के लिए बंद किया जा सकता है।
राजकीय शोक की घोषणा के साथ, सरकारी सम्मान के साथ अंतिम संस्कार भी किया जाता है – जैसे 21 तोपों की सलामी, बंदूक salute, तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर आदि।
गुरुवार, 3 अप्रैल 2025
Food rules of life
सोमवार, 17 फ़रवरी 2025
बीबीसी के नाम पर तानाशाही और अघोषित आपातकाल
गुरुवार, 27 जून 2024
नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास
सुभद्रा कुमारी चौहान जी की वीर रस पूर्ण कालजयी कविता झांसी वाली रानी
मंगलवार, 16 जनवरी 2024
गुरु गोबिन्द सिंह जन्मोत्सव
🌞 *गुरु जी की महानता का मैं अकिंचन बखान नहीं कर सकता फिर भी उनके जन्मोत्सव पर दो शब्द लिखने का प्रयास उनकी कृपा से कर रहा हूं, गुरु जी नियामत बख्शे*🌞
*गुरु गोबिन्द सिंह* सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। श्री गुरू तेग बहादुर जी के बलिदान के उपरान्त 11 नवम्बर सन् 1675 को 10 वें गुरू बने। गुरु जी एक महान योद्धा, चिन्तक, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन् 1699 में बैसाखी के दिन उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
आपजी का जन्म: पौषशुक्ल सप्तमी संवत् 1723 विक्रमी तदनुसार 22 दिसम्बर 1666- को पटना साहिब में हुआ।
*गुरु साहब का संक्षिप्त जीवन परिचय*
जन्म नाम गोबिन्द राय
जन्मदिन 22 दिसंबर , 1666
जन्मस्थान पटना बिहार, भारत
मृत्यु 7 अक्टूबर 1708 (उम्र 42)
निर्वाण स्थली नांदेड़, महाराष्ट्र, भारत
पदवी सिखों के दसवें गुरु
*प्रसिद्धि का कारण*
दसवें सिख गुरु, सिख खालसा सेना के संस्थापक एवं प्रथम सेनापति
पूर्वाधिकारी- गुरु तेग बहादुर
उत्तराधिकारी- गुरु ग्रंथ साहिब
पंथ- सिख
जीवनसाथी- माता जीतो जी
बच्चे- अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फतेह सिंह
माता-पिता गुरु तेग बहादुर, माता गूजरी
गुरु गोबिन्द सिंह ने पवित्र (ग्रन्थ) गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में प्रतिष्ठित किया। बचित्तर नाटक उनकी आत्मकथा है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ (ग्रन्थ), गुरु गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।
इन्होने अन्याय, अत्याचार और पापों को खत्म करने और सनातन धर्म की रक्षा के लिए मुगलों के साथ 14 युद्ध लड़े। धर्म की रक्षा के लिए समस्त परिवार का बलिदान किया, जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' (पूरे परिवार का दानी ) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले, आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं।
विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय होने के साथ-साथ गुरु गोविन्द सिंह एक महान लेखक, मौलिक चिन्तक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रन्थों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। ५२ कवि और साहित्य-मर्मज्ञ उनके दरबार की शोभा बढ़ाते थे। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे। इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता है।
उन्होंने सदा प्रेम, सदाचार और भाईचारे का सन्देश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। गुरुजी की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं *_भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन_*। वे बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौजन्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके जीवन का प्रथम दर्शन ही था कि *"धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की सदैव विजय होती है"*।
*गुरू दास B.R.Ojha 9461205281*